सदा संकल्प को साथी बनाकर पग बढ़ाना है,
विकल्पों से भरी गलियों में केवल गुनगुनाना है।
स्व को जबतक नहीं पहचान पाया भटकता घूमा,
पुरुष हूँ हर समय उत्साह का उत्सव मनाना है ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७९६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७८
हम क्षुद्र स्वार्थों से बचने का प्रयास करते रहें, आत्मनिरीक्षण करें, पर्यावरण और परिवेश का परीक्षण करें, हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक कर्म और प्रत्येक संकल्प समाज तथा राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पित हो। हम समान विचारधारा के व्यक्तियों का संगठन करें और उसके माध्यम से राष्ट्रभक्त समाज को आश्वस्त करें कि अंधकार ही व्याप्त नहीं है l
हमारा सनातन धर्म अद्भुत और अनुपम है। हम संपूर्ण वसुधा को अपना कुटुम्ब मानते हैं l एकात्म भाव भारतवर्ष की एक विलक्षण निधि है l हमारी शिक्षा-पद्धति केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं,अपितु मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के निर्माण का दिव्य साधन है। वह हमें सिखाती है कि शिक्षा प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग है; अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; सूचना नहीं, बल्कि आत्मप्रकाश है।
भारतीय परम्परा में गुरु और शिष्य दोनों सत्य के साधक हैं। गुरु ज्ञान के प्रदाता मात्र नहीं, अपितु जीवन के पथ-प्रदर्शक हैं और शिष्य केवल श्रोता नहीं, बल्कि श्रद्धा, जिज्ञासा तथा साधना के द्वारा सत्य का अन्वेषी है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—ज्ञान के माध्यम से आत्मोन्नति, चरित्र-निर्माण, समाज और देश के लोकमंगल की स्थापना। इसी महान आदर्श का उद्घोष वैदिक शान्तिमन्त्र "ॐ सह नाववतु..." करता है, जिसमें गुरु और शिष्य साथ-साथ संरक्षण, पोषण, पुरुषार्थ, तेजस्विता तथा परस्पर सद्भाव की प्रार्थना करते हैं। यह सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश है l इसी प्रकार के शाश्वत संदेशों को लोकभाषा में जन-जन तक पहुँचाने का दिव्य कार्य राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाजसेवी गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के माध्यम से किया। आइये प्रवेश करें मानस की इस दिव्य कथा में
अच्छे से अच्छा उपदेश, उत्कृष्ट शिक्षा तथा श्रेष्ठ संगति भी उस व्यक्ति जैसे रावण का सुधार नहीं कर सकती, जिसकी नीयत दूषित हो अथवा जो अपनी मूर्खता, अहंकार और हठधर्मिता का परित्याग करने के लिए तैयार न हो l
फूलहिं फरहिं न बेत, जदपि सुधा बरसहिं जलद।
मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम॥
मन्दोदरी रावण को अत्यन्त विनयपूर्वक समझा रही है कि श्रीराम को साधारण मनुष्य समझने की भूल मत करो। वे समस्त चराचर जगत के स्वामी, परमब्रह्म और धर्म के अधिष्ठाता हैं। उनसे वैर करने में किसी का कल्याण नहीं है। तुम अहंकार का परित्याग कर सीताजी को ससम्मान लौटा दो और श्रीराम की शरण ग्रहण कर लो l
आगे आचार्य जी ने अंगद का उल्लेख करते हुए कथा में क्या बताया,आचार्य जी ने किस प्रकार मधु कैटभ जो भगवान की रज और तम शक्तियां हैं से संबन्धित कथा बताई, सनातन धर्म की शोभा के रूप में प्रतिष्ठित दिव्य कथाओं का आनन्द प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना चाहिए, भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l