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प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९७ वां* सार -संक्षेप

 यत् त्वया मत्तः अधीतं तद् उत्सृज।"

"जो यजुर्वेद तुमने मुझसे पढ़ा है, उसे त्याग दो (उगल दो)।"


यह प्रसिद्ध संवाद महर्षि वैशम्पायन और याज्ञवल्क्य के बीच की एक पौराणिक घटना को दर्शाता है, जिसके परिणामस्वरूप यजुर्वेद का विभाजन हुआ था l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७९

 राष्ट्र हमारी सर्वोच्च निष्ठा, हमारी भक्ति, हमारी शक्ति, हमारी पूजा और हमारे अटूट विश्वास का आधार है, अतः शिक्षा का प्रत्येक आयाम भी राष्ट्रहित, संस्कृति-संरक्षण और लोककल्याण के आदर्शों से प्रेरित होना चाहिए।



वेद प्राचीन शैक्षिक परम्परा का मूल आधार हैं । वेद केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं हैं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, भाषा, गणित, चिकित्सा, खगोल, पर्यावरण तथा नैतिक जीवन के आदिम स्रोत हैं। अतः वैदिक ज्ञान का गंभीर अध्ययन आवश्यक है, जिससे हम प्रमाणपूर्वक यह प्रतिपादित कर सकें कि भारतीय शैक्षिक परम्परा अत्यन्त प्राचीन, समृद्ध और मानव के लिए अत्यन्त कल्याणकारी रही है।हमने अपना उद्देश्य निर्धारित किया है 

 *वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः* यजुर्वेद ९.२३


यदि हम राष्ट्र के प्रति जाग्रत हैं, यदि राष्ट्र ही हमारी भक्ति, हमारी शक्ति, हमारी पूजा और हमारा अटूट विश्वास है, तो हमारी शिक्षा भी उसी से अनुप्राणित होनी चाहिए। ऐसी शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन न होकर राष्ट्रनिर्माण, चरित्र-निर्माण, सांस्कृतिक संरक्षण तथा कर्तव्यबोध का माध्यम बने। जब शिक्षा का लक्ष्य राष्ट्र के गौरव, संस्कृति और लोककल्याण से जुड़ता है, तभी वह अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती है।

यही आदर्श श्रीरामचरितमानस में भगवान् श्रीराम के चरित्र में प्रत्यक्ष दिखाई देता है।

आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं l


गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज॥

श्रीराम के चरणकमलों का स्मरण करके अंगद रावण की सभा में पहुँचे। वे सिंह के समान निर्भीक और तेजस्वी थे। उन्होंने सभा में चारों ओर निडर दृष्टि डाली। वे धैर्य, वीरता और अपार बल के साक्षात् स्वरूप थे।

अंगद का चरित्र इस बात का आदर्श है कि जो व्यक्ति उच्च आदर्शों, गुरु और राष्ट्रधर्म के प्रति निष्ठावान होता है, वही विपरीत परिस्थितियों में भी सिंह के समान निर्भय रहता है।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,पद्धति ग्रंथ किसे कहते हैं,उन्नाव विद्यालय में चल रहे पूर्त कार्यों का उल्लेख आचार्य जी ने क्यों किया, भैया मनीष कृष्णा जी के घर पर कल संपन्न हुई बैठक में कौन कौन उपस्थित रहा, अधिवेशन में शिक्षा विषय पर प्रस्ताव पारित  कराने हेतु आचार्य जी ने क्या सुझाव दिया जानने के लिए सुनें l