प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७७४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५६
आगामी अधिवेशन की सफलता के लिए हम सभी मनोयोगपूर्वक जुट जाएँ। पूर्ण समर्पण, उत्साह और उत्तरदायित्व-बोध के साथ संगठित होकर कार्य करें। हमारी एकता, अनुशासन और सामूहिक पुरुषार्थ ही अधिवेशन को सफल, गरिमामय और उद्देश्यपूर्ण बनाएँगे l
शिक्षक नौकर नहीं होता है , वह समाज का संस्कारदाता और राष्ट्र का निर्माता होता है। नौकरी करना अपेक्षाकृत सरल है, किन्तु शिक्षक होना अत्यन्त दुष्कर उत्तरदायित्व है। जिस व्यक्ति में जी३वनपर्यन्त शिक्षकत्व का बोध, कर्तव्यनिष्ठा और लोकमंगल की भावना बनी रहती है, वही वास्तव में भारतराष्ट्र के कल्याण का महान साधक बनता है। उसके द्वारा प्रदान किए गए संस्कार पीढ़ियों का निर्माण करते हैं और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला रखते हैं।
शिक्षक अपने शिष्य को पुत्रवत् स्नेह प्रदान करता है। वह उसे दुलारता है, पुचकारता है, आवश्यकता होने पर अनुशासन का महत्त्व भी समझाता है। शिष्य की प्रगति, चरित्र-निर्माण और यशस्विता के लिए वह निरन्तर चिन्तित रहता है तथा उसे भी चिन्तन मनन के लिए प्रेरित करता है, शिष्य को सत्कर्मोन्मुख करता है । शिष्य की सफलता में ही शिक्षक अपनी सफलता का दर्शन करता है। आचार्य जी ऐसे ही शिक्षक हैं l
सच्चा शिक्षक केवल विषयज्ञान नहीं देता, अपितु जीवन जीने की कला भी सिखाता है। वह अपने शिष्यों को बताता है कि कर्म करते रहो, फल की चिन्ता मत करो l वह उसे आत्मा की नित्यता और शरीर की नश्वरता का बोध कराता है। ऐसे शिष्य को जब कर्म, कर्तव्य, आत्मा और जीवन के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, तब वह जीवन से ऊबता नहीं, बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में उसका आनन्द लेना सीख जाता है l श्रीरामचरितमानस हमें शक्ति बुद्धि विचार कौशल और संगठन की महत्ता का उद्बोध कराता है l भगवान राम ने मनुष्य के रूप में जीवन का जी आदर्श प्रस्तुत किया वह अद्वितीय है l
जब-जब धर्म की हानि होती है और दुष्ट, अधर्मी तथा अभिमानी लोगों का प्रभाव बढ़ने लगता है, तब-तब करुणासागर भगवान विभिन्न अवतार धारण करके सज्जनों की पीड़ा का निवारण करते हैं तथा धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।
भगवान राम समुद्र पार करने के लिए विचार कर रहे हैं
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥3॥
हे वानरराज! हे वीर लंकापति! बताइए, इस गम्भीर समुद्र को किस प्रकार पार किया जाए? यह समुद्र मगरमच्छों, सर्पों और विशाल मछलियों से भरा हुआ है। इसकी गहराई अथाह है और इसे पार करना हर प्रकार से अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है।
यद्यपि भगवान राम सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं, तथापि वे लोकमर्यादा का पालन करते हुए अपने सहयोगियों से परामर्श करते हैं। इससे नेतृत्व का यह आदर्श प्रकट होता है कि महानतम व्यक्ति भी सामूहिक विचार-विमर्श का सम्मान करता है और महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोगियों की राय लेता है।अद्भुत है भगवान राम की माया लीला l
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भगवान राम के एकनिष्ठ सेवक कौन हैं, भैया पंकज जी की किस पुस्तक की चर्चा हुई, शुक और सारण, जो रावण के दो प्रमुख मंत्री तथा गुप्तचर थे, क्यों चर्चा में आये जानने के लिए सुनें l