प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७७३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५५
शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति करते हुए संगठन के लिए जब हम एकत्र हों उसमें धन को अधिक महत्त्व न दें अन्यथा मन व्यग्र होगा साथ ही दंभ अहंकार से भी बचें l संगठन में प्रेम और आत्मीयता महत्त्वपूर्ण है l
सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को सामर्थ्य, साहस और उत्तरदायित्व से युक्त बनाने वाली संस्कृति है। किसी भी देवी देवता को हम देखें तो उनके हाथों में शस्त्र दिखेंगे l ये शस्त्र केवल युद्ध के उपकरण नहीं हैं, वे धर्मरक्षा, अन्याय-प्रतिरोध, आत्मसंयम और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु का चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल, माँ दुर्गा के विविध आयुध और भगवान राम का धनुष सभी यह संदेश देते हैं कि सज्जनता के साथ शक्ति का होना भी आवश्यक है। मां सरस्वती के हाथों में वीणा है वह भी शक्ति और शौर्य को उद्भासित कर रही है वह आत्मिक शक्ति का स्रोत है l
वैदिक वाक्य “वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” हमारे जैसे प्रत्येक जागरूक नागरिक का आदर्श है। सनातन परम्परा हमें सिखाती है कि धर्म का पालन केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित न रहे, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण से भी जुड़ा हो।
आज आवश्यकता है कि सनातनी समाज अपने भीतर शौर्य, आत्मविश्वास, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का विकास करे। ऐसा समाज जो ज्ञान में प्रखर हो, चरित्र में दृढ़ हो, सेवा में अग्रणी हो और आवश्यकता पड़ने पर धर्म तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए खड़ा होने का साहस रखता हो। इसके लिए हमारी शिक्षा भी महत्त्वपूर्ण है
वर्तमान समय में चल रही शिक्षा निराशा हताशा कुंठा को वृद्धिंगत कर रही है यह शिक्षा व्यापार है l हमारे लिए इसे परिवर्तित करना नितान्त आवश्यक है l
गोस्वामी तुलसीदास ने अपने युग की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया। उन्होंने यह अनुभव किया कि समाज दिशाहीनता, निराशा और विघटन की ओर अग्रसर हो रहा है। अतः लोकमंगल की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने श्रीरामचरितमानस की रचना की, जिससे जनसामान्य को धर्म, नीति, सदाचार, भक्ति और आदर्श जीवन के मूल्यों का सरल एवं प्रभावी शिक्षण प्राप्त हो सके l
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥49क
रावण का क्रोध अग्नि के समान था और उसकी उग्र श्वासें उस अग्नि को प्रचण्ड बनाने वाली वायु के समान थीं। ऐसे भयंकर क्रोध की अग्नि में विभीषण मानो जल रहे थे। उस समय श्रीराम ने उन्हें अपनी शरण में लेकर न केवल उनकी रक्षा की, बल्कि आगे चलकर उन्हें अखण्ड लंका का राज्य भी प्रदान किया।
अधर्म के बीच सत्य का पक्ष लेने वाला व्यक्ति यदि अकेला भी पड़ जाए, तो ईश्वर स्वयं उसका सहारा बनते हैं।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बैठकों के लिए क्या परामर्श दिया, युगभारती प्रार्थना की चर्चा क्यों हुई, प्रार्थना का दूसरा छंद कहां से लिया गया है जानने के लिए सुनें l