सिंधु तरो उनको बनरा, तुसपै धनुरेख गई न तरी।
बाँध्योइ बाँधत सो न बँध्यो उन बारिधि बाँधि कै बाट करी।।
अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसकंठ न जानि परी।
तेलनि तूलनि पूँछि जरी (जड़ी हुई, युक्त) न जरी गढ़, लंक जराई जरी।।26।।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७९८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८०
हम अपने संगठन में संवेदनशीलता , सहयोग, सहानुभूति का ध्यान रखें l
हम मनुष्य हैं। विचार, भावना और संवेदना ही हमें अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाती है। भावों का विश्लेषण करना, दूसरों के सुख-दुःख को अनुभव करना और उनके प्रति आत्मीयता रखना मनुष्य होने का वास्तविक लक्षण है। यही मनुष्यत्व है l संवेदनशीलता मनुष्य को प्राप्त परमात्मा का एक अनुपम उपहार है यह उनकी कृपा का प्रसाद और जीवन का अमूल्य वरदान है।
हम सब युगभारती से संयुत हैं, जो दीनदयाल विद्यालय के पूर्व छात्रों द्वारा संचालित एक विशिष्ट संस्था है। हमारे संगठन की वास्तविक शक्ति केवल हमारी संख्या, संसाधनों या व्यवस्थाओं में नहीं, बल्कि हम सदस्यों के बीच विद्यमान संवेदना, सहयोग, सहानुभूति और पारस्परिक विश्वास में निहित है।
जैसे मानव-शरीर के सभी अंग एक-दूसरे के सुख-दुःख से जुड़े रहते हैं और मिलकर सम्पूर्ण शरीर को स्वस्थ एवं सक्षम बनाते हैं, वैसे ही प्रत्येक सदस्य भी एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी है। जब किसी एक सदस्य को आवश्यकता हो, तब अन्य सदस्य उसके साथ खड़े हों; जब किसी को सफलता मिले, तो सभी उसकी प्रसन्नता में सहभागी बनें। यही संगठनात्मकता हमारी संस्था को जीवंत, सशक्त, समाज और राष्ट्र के लिए कल्याणकारी और दीर्घजीवी बना देगी l
आइए, हम केवल एक संस्था के सदस्य न रहें, बल्कि एक परिवार की भाँति संवेदना, सहयोग, सहानुभूति और सेवा के भाव से संयुत रहें। यह रामात्मकता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और यही हमारी पहचान भी।
रामकथा में एक प्रसंग आता है जब लक्ष्मण जी संजीवनी बूटी के प्रभाव से पुनः सचेत हुए
हृदय घाउ मेरे पीर रघुबीरै |
पाइ सजीवन, जागि कहत यों प्रेमपुलकि बिसराय सरीरै ||
मोहि कहा बूझत पुनि पुनि, जैसे पाठ-अरथ-चरचा कीरै |
सोभा-सुख, छति-लाहु भूपकहँ, केवल कान्ति-मोल हीरै ||
तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरै |
उपमा राम-लषनकी प्रीतिकी क्यों दीजै खीरै-नीरै ||
यह पद भ्रातृ-प्रेम, सेवा, समर्पण और आत्मविस्मृति का अनुपम आदर्श प्रस्तुत करता है। तुलसीदास इस प्रसंग के माध्यम से बताते हैं कि सच्चा प्रेम वही है जिसमें अपने सुख-दुःख का बोध मिट जाए और प्रिय के सुख-दुःख में ही अपना जीवन समाहित हो जाए।
आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं
दसन गहहु तृन कंठ कुठारी, परिजन सहित संग निज नारी।सादर जनकसुता करि आगें, देहु राम कहँ बिसरिहि लागें।
अंगद रावण को समझाते हुए कहते हैं कि "हे रावण! तुम अपने दाँतों में तिनका दबाकर (अर्थात पूर्ण दीनता व क्षमा याचना की मुद्रा में) और गले में कुठार (कुल्हाड़ी) डालकर, अपने परिवार तथा अपनी पत्नी के साथ, माता सीता को आदरपूर्वक आगे करके श्रीराम को सौंप दो, तभी तुम्हारा कल्याण होगा।"
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ऐसा ज्ञान जो अंतःकरण में विवेक का दीप प्रज्वलित करे को आचार्य जी ने किस उदाहरण से स्पष्ट किया जानने के लिए सुनें
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