10.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी /एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी /एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८८

शौर्य शक्ति की अनुभूति करते हुए संगठन में प्रेम और आत्मीयता का विस्तार कर राष्ट्रोन्मुख और समाजोन्मुख हों l


आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं युद्ध प्रारम्भ हो चुका है आइये युद्धस्थल में प्रवेश कर जाएं -


पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा।

पावक सायक सपदि चलावा॥

भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं।

ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥


इसके पश्चात् कृपालु भगवान् श्रीराम मुस्कराकर धनुष पर अग्निबाण चढ़ाते हैं और तुरंत उसका संधान करते हैं। उस अग्निबाण के प्रभाव से चारों ओर प्रकाश फैल जाता है; कहीं भी अंधकार नहीं रह जाता। जैसे आत्मज्ञान के उदय होने पर मन के सभी संशय नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही उस प्रकाश से समस्त अंधकार मिट जाता है।

तुलसीदासजी यहाँ केवल युद्ध का दृश्य नहीं दिखाते, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक सत्य भी प्रकट करते हैं। युद्धभूमि का यह दृश्य साधक के अंतःकरण का भी चित्र है। जब तक मन में अज्ञान का अंधकार है, तब तक संशय, भय और मोह बने रहते हैं। परन्तु श्रीराम की कृपा से ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होते ही ये सभी विकार समाप्त हो जाते हैं। मनुष्य के जीवन में समस्याओं का मूल कारण प्रायः अज्ञान और भ्रम होता है। सत्य का ज्ञान, सद्गुरु का उपदेश तथा भगवान् की कृपा जीवन के समस्त संशयों का निवारण कर देती है। इसलिए बाहरी अंधकार से अधिक आवश्यक है कि हम अपने अंतःकरण के अज्ञानरूपी अंधकार को ज्ञानरूपी प्रकाश से दूर करें। आचार्य जी नित्य यही कर रहे हैं ताकि आर्यसंस्कृति के उपासक हम सनातनधर्मियों को 

 रामत्व की अनुभूति हो और  हम अपने भीतर शक्ति बुद्धि विचार विवेक प्राप्त कर देशहित और समाजहित के कार्यों में संलग्न हों जिस देश को भगवान राम का ऐसा अद्भुत नेतृत्व मिला हो उसे १९६२ के चीन से युद्ध में भारी मूल्य चुकाने के लिए विवश होना पड़ा l यदि हम आत्मबल के साथ परमात्म की शक्ति की अनुभूति करते रहेंगे तो हमें इस प्रकार विवश नहीं होना पड़ेगा l इसके लिए हमें संगठन की महत्ता को भी समझना होगा और संगठन को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रेम और आत्मीयता का विस्तार आवश्यक है संगठन के हर सदस्य को प्रेम की पराकाष्ठा का दर्शन हो जैसा मानस के निम्नांकित प्रसंग में दिखा 


मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी॥

परम प्रेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥1॥


मिलन की प्रीति कैसे बखानी जाए? वह तो कविकुल के लिए कर्म, मन, वाणी तीनों से अगम है। दोनों भाई (भरतजी और श्री रामजी) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भुलाकर परम प्रेम से पूर्ण हो रहे हैं


श्रीराम और भरतजी का यह मिलन लौकिक स्नेह से कहीं ऊपर, दिव्य प्रेम की पराकाष्ठा का दर्शन कराता है। दोनों भाई प्रेम में इतने तल्लीन हो गए कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार—अन्तःकरण के चारों अंग मानो अपनी सत्ता ही भूल गए। मन का संकल्प-विकल्प, बुद्धि का विचार, चित्त का स्मरण तथा अहंकार का 'मैं' भाव—सब प्रेम में विलीन हो गए। उस समय उनके अन्तःकरण में केवल निष्काम, निर्मल और आत्मसमर्पित प्रेम ही प्रवाहित हो रहा था। यह प्रसंग बताता है कि जहाँ प्रेम पूर्णतः निःस्वार्थ और ईश्वरमय होता है, वहाँ अहंकार तथा समस्त मानसिक भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं और केवल एकत्व, अपनत्व तथा आनन्द का अनुभव शेष रह जाता है। यही सच्चे प्रेम और भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने तुलसीदास जी के अन्य किन ग्रंथों की चर्चा की, भैया डा पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें