9.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८७


हम भी संसार की अनेक समस्याओं और चुनौतियों के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि हम भी यशस्विता की आकांक्षा रखते हैं—चाहे वह हमारे व्यक्तिगत पुरुषार्थ के माध्यम से प्राप्त हो, चाहे हमारे परिवार के द्वारा अथवा युगभारती संस्था के माध्यम से।

किन्तु हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यश हमारा लक्ष्य नहीं, अपितु सत्य, धर्म और लोकमंगल के प्रति निष्ठापूर्ण कर्म का स्वाभाविक परिणाम होना चाहिए। यदि हमारा ध्यान केवल सत्य, कर्तव्य और अपने ध्येय पर स्थिर रहेगा, तो प्राप्त होने वाला यश भी सार्थक होगा और हमारी साधना भी निष्कलुष बनी रहेगी। 



कीट मनोरथ दारु शरीरा।

जेहि लगि घुन कोसि बसि धीरा।।


मनुष्य का शरीर लकड़ी के समान है और उसकी असंख्य इच्छाएँ उस लकड़ी में लगे घुन के समान हैं। जैसे घुन लकड़ी को भीतर ही भीतर खोखला कर देता है, वैसे ही अनियंत्रित कामनाएँ मनुष्य के जीवन और अन्तःकरण को भीतर-ही-भीतर क्षीण एवं दुर्बल कर देती हैं।

इस उपमा के द्वारा तुलसीदास जी यह शिक्षा देते हैं कि यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर संयम नहीं रखता, तो वे उसकी शान्ति, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का नाश कर देती हैं। अतः जीवन को सार्थक बनाने के लिए कामनाओं पर नियंत्रण तथा भगवान् की भक्ति और वैराग्य का आश्रय आवश्यक है।


"सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मालिनी।।"


यहाँ "ईषणा-त्रय" का उल्लेख है गोस्वामी तुलसीदास जी इस चौपाई में संकेत करते हैं कि पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा—ये तीनों ऐसी प्रबल आसक्तियाँ हैं, जिन्होंने बड़े-बड़े बुद्धिमानों के विवेक को भी मलिन कर दिया है। सत्य के मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए ये बाधाओं के समान हैं। जब मनुष्य पुत्र-मोह, धन-लालसा अथवा यश-प्राप्ति की इच्छा से प्रेरित होकर कार्य करता है, तब उसके निर्णय निष्पक्ष नहीं रह जाते और सत्य का मार्ग धूमिल होने लगता है।


अतः सत्य के साधक का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन का केन्द्र केवल सत्य, धर्म तथा कर्तव्य को बनाए। उसका ध्यान सदैव अपने परम लक्ष्य पर स्थिर रहे। तब कोई भी मोह, प्रलोभन, भय अथवा प्रतिष्ठा की आकांक्षा उसे सत्य के पथ से विचलित नहीं कर सकेगी। यही दृढ़ता साधना की सफलता का आधार है और यही धर्ममय जीवन की पहचान भी है।

आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं जहां राम- रावण युद्ध चल रहा है 

भगवान् श्रीराम लंका के शासक और उसकी प्रजा के मनोबल को क्षीण कर रहे हैं । रावण हनुमान जी का अद्भुत पराक्रम प्रत्यक्ष देख चुका था। उसने अकेले हनुमान जी द्वारा अशोकवाटिका का विध्वंस, अनेक राक्षसों का संहार और लंका-दहन का दृश्य अपनी आँखों से देखा था। इसके पश्चात् अंगद ने रावण की सभा में अपने अद्वितीय बल, धैर्य और निर्भीकता का परिचय देकर उसके आत्मविश्वास को और भी डिगा दिया।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने चीन से अब हमारे भयभीत न होने का क्या कारण बताया, चम्पत राय का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l