प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८०८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९०
लोकाभ्युदय और राष्ट्राभ्युदय हेतु हमारे छोटे छोटे प्रयास एक विराट् शक्ति का निर्माण करेंगे अतः ऐसे प्रयास करते चलें
जिनकी रक्षा स्वयं चिरञ्जीवी पवनपुत्र श्रीहनुमान जी जिनके पराक्रम का वर्णन करता कवितावली का निम्नांकित छंद है
जो दससीसु महीधर ईस को बीस भुजा खुलि खेलनिहारो।
लोकप, दिग्गज, दानव, देव सबै सहमे सुनि साहसु भारो।
बीर बड़ो बिरूदैत बली, अजहूँ जग जागत जासु पँवारो।
सो हनुमान हन्यो मुठिकाँ गिरि गो गिरिराजु ज्यों गाजको मारो।38 l
जिस रावण के दस सिर थे, जो कैलास पर्वत के स्वामी भगवान शंकर के साथ अपनी बीस भुजाओं का बल दिखाते हुए खेल करने का साहस रखता था; जिसके पराक्रम का नाम सुनकर लोकपाल, दिग्गज, दानव और देवता तक भयभीत हो जाते थे;
जो महान वीर, अत्यन्त बलशाली और अपार यश वाला था, जिसकी कीर्ति आज भी संसार में प्रसिद्ध है उसी रावण को भक्तश्रेष्ठ श्रीहनुमान जी ने अपने एक घूँसे के प्रहार से ऐसा आहत कर दिया, जैसे वज्र के प्रहार से कोई विशाल पर्वत काँप उठे।
करते हैं, उन्हें किसी प्रकार का भय, भ्रम हो ही नहीं सकता l रामभक्त-शिरोमणि श्रीहनुमानजी के दिव्य अनुग्रह से उत्साहजनक वातावरण बन रहा है और हमारी बाधाएँ एक-एक करके दूर होती जा रही हैं, जिससे आगामी अधिवेशन सफलतापूर्वक अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहा है ।
हम इस अधिवेशन के माध्यम से राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज को यह संदेश देने आए हैं कि शिक्षा वही हो जो भारत की सनातन परम्परा, संस्कृति और जीवन-मूल्यों पर आधारित हो, केवल मैकाले की शिक्षा-पद्धति का अनुकरण करने वाली नहीं। हमारा उद्देश्य समाज के भय, भ्रम और आत्मविस्मृति को दूर कर भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति पुनः जागरण उत्पन्न करना है।
अपने विचारों और व्यवहार में सनातनत्व, भाव, भक्ति और भारतीयता से ओत-प्रोत भाषा को अपनाना निश्चित रूप से हमारा कल्याण करेगा साथ-साथ हमें यशस्विता भी स्वाभाविक रूप से प्राप्त होगी।
आइये हनुमानाश्रित होकर प्रवेश कर जाएं लंका कांड में
जहां माल्यवान् जो रावण का वृद्ध, बुद्धिमान और अनुभवी मंत्री (तथा मातामह) था, रावण को समझाने का प्रयास कर रहा है वह रावण को नीति का उपदेश देते हुए समझाता है कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे वही परम भगवान हैं जिन्होंने पूर्वकाल में मधु-कैटभ, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे महादैत्यों का वध किया था। इसलिए रावण को सीता जी को सम्मानपूर्वक लौटा देना चाहिए और श्रीराम से वैर त्याग देना चाहिए।
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।
जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥48 क॥
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया उन्नाव विद्यालय की चर्चा क्यों हुई अधिवेशन हेतु क्या शुल्क निर्धारित हुआ है जानने के लिए सुनें