ध्रुव जहाँ अनोखा तपकर्ता, प्रह्लाद भक्ति की सीमा है।
अभिमन्यु शौर्य का तेजपुञ्ज जिसके आगे रवि धीमा है।
जोरावर, फतह, अजीत सिंह विक्रम, जुझारू का अलबेला।
केसरी-सुवन सा बाल शौर्य भारत के कण-कण पर खेला।
विक्रम की अक्षय कोष तपस्या की धरती सविशेष॥५॥
पावन मेरा देश ..........
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८०९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९१
भारत की संस्कृति अद्भुत है यदि हमारा रुझान अपनी संस्कृति, सभ्यता और सनातन मूल्यों के प्रति दृढ़ बना रहेगा, तो कोई भी वैचारिक आक्रमण हमें दुर्बल नहीं कर सकेगा।
वर्तमान समय में वैचारिक संघर्ष का प्रबल तूफ़ान चल रहा है। ऐसे समय में अपनी संस्कृति, परम्पराओं और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूकता तथा निष्ठा ही हमें स्थिर, सशक्त और आत्मविश्वासी बनाए रख सकती है।
हम सब अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि हमारा जन्म भारत जैसी पुण्यभूमि में हुआ है। यह वही भूमि है जहाँ वेदों का प्रकाश हुआ, ऋषियों ने तप किया और अनगिनत महापुरुषों ने मानवता को धर्म, ज्ञान और सदाचार का मार्ग दिखाया।
और हम तो विशेष रूप से धन्य हैं कि हमारा जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ । यही वह पावन भूमि है जहाँ भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ और जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाल एवं किशोर लीलाओं से इस धरती को पवित्र किया।
अपनी दुर्बलता के कारण किसी विधर्मी या विदेशी शक्ति का हमारे ऊपर शासन करना हमें कभी स्वीकार्य नहीं रहा । इतिहास साक्षी है कि महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज,श्री गुरु गोविन्द सिंह आदि ने अन्याय, पराधीनता और धार्मिक-राजनीतिक दमन को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने शौर्य ,पराक्रम,स्वाभिमान, संगठन और धर्मनिष्ठा के बल पर स्वतंत्रता तथा सम्मान की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष किया। यही देशाचार है और यह सदाचार का एक भाग है सदाचार के अन्य भाग हैं जात्याचार और कुलाचार l मनु महाराज के अनुसार सदाचार धर्म के चार लक्षणों में से एक है
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्।।
सदाचार को विस्तार से समझने के लिए हम कालिका पुराण अध्याय ८६,
वामन पुराण अध्याय १४,
पद्म पुराण स्वर्ग खंड,
मार्कण्डेय पुराण आदि का आश्रय ले सकते हैं
गोस्वामी तुलसीदास ने उस काल में श्रीरामचरितमानस की रचना की जब भारत पर विधर्मी का शासन था।
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥3॥
मेघनाद कहता है
मेरे पराक्रम का प्रदर्शन कल प्रातः देख लेना। बहुत क्या कहूँ, कल युद्ध में सब स्पष्ट हो जाएगा l
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भगवान राम और रावण के स्वार्थ में क्या अन्तर है,वीररस का आदिमहाकाव्य कौन सा है जानने के लिए सुनें l