3.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्थी ( कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी ) विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८१

अपने भीतर रामात्मकता धारण करें जिससे हम जाग्रत और सचेत रहेंगे आत्मचिन्तन करते हुए अपने भीतर के मल का निरसन करते रहेंगे l शुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध राष्ट्रोन्मुख समाजोन्मुख होंगे l



जो स्वयं अपने दोषों, सीमाओं और अंतःकरण का निष्पक्ष अवलोकन नहीं कर सकता, वह दूसरों के गुण-दोषों का यथार्थ मूल्यांकन भी नहीं कर सकता। आत्मदर्शन विवेक, विनम्रता और न्यायबुद्धि का आधार है। जो व्यक्ति पहले स्वयं को परखता है, वही दूसरों के विषय में संतुलित, निष्पक्ष और सार्थक मत देने का अधिकारी होता है। 

आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के उस प्रसंग में हैं जहां अंगद जी और रावण के बीच संवाद चल रहा है

सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला॥

आवा प्रथम नगरु जेहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा॥


रावण अपनी सभा में वानर-सेना का उपहास करते हुए कहता है कि नल और नील तो केवल शिल्पकला में निपुण हैं। वे समुद्र पर सेतु बनाने जैसे निर्माण-कार्य जानते हैं, युद्ध करना उनका कार्य नहीं है। हाँ, उनमें एक वानर अवश्य अत्यन्त बलशाली है वही जो पहले लंका में आया था और अकेले ही पूरी लंका को अग्नि के हवाले कर गया था l 

रावण के मुख से यह बात सुनकर बालि-पुत्र अंगद जी मुस्कराकर उत्तर देने लगे। वे समझ गए कि रावण बाहर से अहंकार दिखा रहा है, पर भीतर से हनुमान जी के पराक्रम को स्वीकार कर चुका है। अब अंगद जी उसके इसी अहंकार को तोड़ने  का प्रयास करते हैं l वे रावण को मानसिक रूप से अत्यन्त शिथिल करना चाहते हैं l 

सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥

तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी॥


 जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म, विवेक, भक्ति, सदाचार और लोकमंगल का भाव नहीं है, उसका जीवन केवल सांस लेने तक सीमित रह जाता है। मनुष्य का वास्तविक जीवन उसके उच्च आदर्शों, सत्कर्मों और ईश्वराभिमुखता से सार्थक होता है।उसका जीवन ईश्वरविमुखता से निरर्थक होता है l



अंगद कहते हैं—"हे दुष्ट! मैं तुझे इसलिए नहीं मारता कि मेरे प्रभु श्रीराम ने मुझे दूत बनाकर भेजा है, योद्धा बनाकर नहीं। दूत का धर्म संदेश देना है, युद्ध करना नहीं। इसलिए अब मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न मत कर।"

वार्तालाप आगे चलता है  किन्तु जब रावण ने भगवान श्रीराम की निन्दा की, तब अंगद जी का धैर्य टूट गया।

जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा।

क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥

हरि हर निंदा सुनइ जो काना।

होइ पाप गोघात समाना॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, आज भी रामत्व कैसे प्रसरित हो रहा है जानने के लिए सुनें l