प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८२३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०५
प्रातःकाल का हमारा जागरण हो , इसके पश्चात् हम शरीर का मार्जन करें ,मन के परिमार्जन हेतु सदाचारमय विचार ग्रहण करें और अपने लक्ष्य का ध्यान रखते हुए कर्मरत हों l
रावण ने अपने आतंक को केवल बल के आधार पर नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीति के माध्यम से फैलाया। उसने अनेक राक्षसों और अपने समर्थकों को विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित किया। ताड़का, खर, दूषण और त्रिशिरा जैसे राक्षस वन क्षेत्रों में सुतीक्ष्ण शरभंग आदि ऋषियों, तपस्वियों पर अत्याचार कर रहे थे। अनेक वनवासी समुदाय भी उसके प्रभाव या भय के कारण उसके पक्ष में दिखाई देते हैं । इस प्रकार रावण ने आतंक का एक संगठित जाल बिछा रखा था।
उस समय अनेक शक्तिशाली राजा अपने-अपने राज्य और दायित्वों तक सीमित रहे। राजा दशरथ ने देवासुर संग्राम में इन्द्र की सहायता कर शम्बर का वध किया, किन्तु रक्तपिपासु रावण के विरुद्ध कोई अभियान नहीं छेड़ा l इसी प्रकार मिथिला के राजा जनक का मुख्य ध्यान अपने राज्य और आध्यात्मिक जीवन पर केन्द्रित था। इस परिस्थिति में ऋषियों,मुनियों पर होने वाले अत्याचार निरन्तर बढ़ते गए।
यह प्रसंग हमें संकेत देता है कि जब समाज का नेतृत्व व्यापक संकट के प्रति संगठित होकर खड़ा नहीं होता, तब अधर्म और आतंक को विस्तार का अवसर मिल जाता है। इसलिए किसी भी युग में राष्ट्र और समाज की सुरक्षा सजग नेतृत्व, सामाजिक एकता और धर्मनिष्ठ नागरिकों से सुनिश्चित होती है।
आज भी यदि राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ समाज में भ्रम, भय, विभाजन का प्रयास करें, तो उनसे सतर्क रहना आवश्यक है l
इतिहास का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यदि हम भी केवल अपने में मग्न रहें और समाज तथा राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों से विमुख हो जाएँ, तो सनातनधर्मी समाज और भारत राष्ट्र के लिए अनिष्टकारी शक्तियों को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। सजग, उत्तरदायी और संगठित समाज ही ऐसे प्रयासों का प्रभावी उत्तर दे सकता है।
भगवान राम का जीवन सिखाता है कि सज्जन व्यक्ति केवल अपने संसार तक सीमित नहीं रहता। वह समाज, धर्म और लोकमंगल के लिए भी उत्तरदायित्व निभाता है। जहाँ अधर्म और आतंक निर्दोषों को पीड़ित करें, वहाँ धर्मनिष्ठ व्यक्ति यथाशक्ति उनके संरक्षण और न्याय के लिए खड़ा होता है। हमें भी यही करना है l
इस प्रेरणा को प्राप्त करने के लिए आइये हम प्रवेश कर जाएं लंका कांड के युद्धक्षेत्र में जहां भगवान राम के ह्रदय में कोई भय नहीं कोई भ्रम नहीं उन्हें अपने शौर्य पराक्रम पर विश्वास है
वे शंकालु विभीषण
(नाथ न रथ नहिं तन पद त्रानां । केहि बिधि जितब बीर बलवाना ।)
को उत्तर देते हैं
सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना । २ ।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ।
बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे । ३ ।
ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा । ४ ।
इसे आचार्य जी ने किस प्रकार समझाया, यम नियम के विषय में क्या बताया, अधिवेशन की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें l