26.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०४

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०४

 हम अपने को भौतिक भंवर से निकालकर कुछ समय यदि आध्यात्मिक चिन्तन, स्वाध्याय,आत्ममन्थन के लिए देते हैं तो निश्चित रूप से हमारा मन उल्लसित रहेगा हमें धैर्य,भक्ति,शक्ति,शौर्य,पराक्रम प्राप्त होगा l


हमारा सनातन धर्म अद्भुत, अनादि और अनन्त है। वेदों के दिव्य मन्त्र, उपनिषदों के अमृततुल्य उद्धरण तथा पुराणों के प्रेरणादायी आख्यान हमारी अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर हैं। यही हमारे जीवन का बल, हमारी संस्कृति का आधार और हमारे आत्मविश्वास का स्रोत हैं। ये हमें ज्ञान, विवेक, साहस, धैर्य और धर्मनिष्ठा की शक्ति प्रदान करते हैं तथा प्रत्येक परिस्थिति में सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देते हैं।

पश्चिमी प्रभावों से भ्रमित होकर यदि हम  वेद, उपनिषद और पुराणों को हेय दृष्टि से देखते हैं, तो हमारा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पतन निश्चित है । इस पतन से बचने के लिए शिक्षा का महत्त्व सर्वोपरि हो जाता है। शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य, स्वावलम्बन और सुरक्षा  हमारी संस्था के चिंतन और कार्य के प्रमुख आयाम हैं।

जब हम संसार की परिस्थितियों को सम्यक् दृष्टि से समझकर उन्हें आत्मसात् करते हैं, तब हम परिस्थितियों के दास नहीं रहते, बल्कि उन पर विवेकपूर्ण दृष्टि से विचार करने लगते हैं।  हमारे भीतर यह दृढ़ विश्वास जाग्रत होता है कि प्रत्येक परिस्थिति में हमें राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सदैव जागरूक रहना है। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः l

गोस्वामी तुलसीदास ने अपने समय की विषम परिस्थितियों को गहराई से समझा। उन्होंने सनातनधर्मी समाज की निराशा, विघटन और सांस्कृतिक शिथिलता को पहचानकर श्रीरामचरितमानस के माध्यम से जन-जन को धर्म, सदाचार, आत्मविश्वास और राष्ट्रचेतना के प्रति जाग्रत किया। इसी ग्रंथ के लंका कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं और उसमें आज हम लोग  एक अत्यन्त प्रेरक प्रसंग *धर्मरथ*, जिसे विभीषण -गीता और राम -गीता के नाम से भी जाना जाता है, में प्रवेश करने जा रहे हैं


यहां गोस्वामी तुलसीदासजी बताते हैं कि जीवन के वास्तविक संघर्षों में विजय बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि धर्मरूपी रथ से प्राप्त होती है। विभीषण व्याकुल हैं भ्रमित हैं 

रावण की सेना में  असंख्य अस्त्र शस्त्र हैं 

और हमारी ओर 


नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥

केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥5॥

विभीषण कहते हैं 


नाथ! न रथ, नहिं तन पद त्राना।

केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥

अर्थात्, "हे नाथ! आपके पास न रथ है, न शरीर का कवच और न ही पैरों में  पदत्राण। ऐसे में आप उस बलवान रावण को कैसे जीतेंगे?"

तब भगवान राम उसे उत्तर देते हैं 


इसके अतिरिक्त भैया पंकज जी भैया पवन जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें