प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८२४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०६
हम कायरता, निराशा, आलस्य और आत्महीनता को अपने ऊपर अधिकार न करने दें। यह हमारे गौरव और इस दिव्य मानव जीवन के अनुरूप नहीं है। हम अपने हृदय की तुच्छ दुर्बलताओं, भय, मोह और संशय का त्याग करें तथा धर्म, सत्य, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा के पथ पर दृढ़तापूर्वक खड़े होकर निष्काम भाव से कर्म में प्रवृत्त हों।
इन सदाचार वेलाओं का श्रद्धापूर्वक श्रवण कर हम मुमुक्षु आत्मानन्द का अनुभव करें, उत्साहपूर्वक अपने कर्तव्यों के प्रति संकल्प जाग्रत करें तथा इस दुर्लभ मानव जीवन को ईश्वरप्रदत्त अनुपम अवसर मानें। निष्काम कर्मयोग की भावना से, फल की इच्छा का त्याग कर, सनातन धर्म, राष्ट्र-निष्ठ समाज और राष्ट्र के कल्याण हेतु निरन्तर कर्मरत रहने का दृढ़ संकल्प लें।
*उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत*
रामकथा हमें यही जीवन-दर्शन प्रदान करती है। भगवान श्रीराम, जिन्होंने जीवन को एक युद्ध माना, का सम्पूर्ण जीवन कर्तव्य, त्याग, मर्यादा और निष्काम कर्म का सजीव आदर्श है। उन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में धर्म का आश्रय लिया, लोकमंगल को सर्वोपरि रखा और बिना किसी स्वार्थ के अपने जीवन को समर्पित किया।
आजकल हम लोग इसी रामकथा के उस प्रसंग में प्रविष्ट हैं जब भयभीत भ्रमित विभीषण को भगवान् राम समझा रहे हैं
विजय बाहरी अस्त्र-शस्त्र या भौतिक सामर्थ्य से नहीं, बल्कि सद्गुणों से निर्मित धर्मरथ पर आरूढ़ होकर ही प्राप्त होती है। जिस व्यक्ति के जीवन में शौर्य और धैर्य का संतुलन हो, सत्य और सदाचार उसकी पहचान हों, बल के साथ विवेक और आत्मसंयम जुड़ा हो तथा उसका प्रत्येक कर्म परोपकार की भावना से प्रेरित हो, उसके जीवन का रथ सम्यक् दिशा में अग्रसर होता है। इस रथ को नियंत्रित करने वाली लगाम क्षमा, करुणा और समता हैं, जो शक्ति को मर्यादा प्रदान करती हैं और व्यक्ति को अहंकार से बचाती हैं l
विभीषण को समझ में आ जाता है
इसके अतिरिक्त भैया पवन जी, भैया पंकज जी के नाम लेकर आचार्य जी ने सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै के भाव को कैसे स्पष्ट किया,आचार्य जी ने किसे ध्यान, विधान,ज्ञान का मंगल अनुमोदन बताया, देशदर्शन क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l