4.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८२

अपनी समीक्षा नित्य करें और देखें कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने जाने अनजाने समाज का अहित कर दिया हो, ध्यान रखें कि हमने अपना लक्ष्य बनाया है समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष  अतः हमें समाज और राष्ट्र के हित के ही कार्य करने हैं l 


गायन्ति देवाः किल गीतिकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते

भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥


यह उद्घोष प्रत्येक हिन्दू,जो पराजित मानसिकता का कभी नहीं रहा, जो अत्यन्त संवेदनशील, समावेशी, भावुक है, जिसने पराश्रयता को कभी स्वीकार नहीं किया,को स्मरण कराता है कि भारत की पवित्र भूमि पर जन्म लेकर वह ऐसा जीवन जिए जो राष्ट्र, संस्कृति और सनातन मूल्यों की प्रतिष्ठा करे तथा अंततः मोक्ष का अधिकारी बने।


देवता स्वयं यह गीत गाते हैं कि धन्य हैं वे मनुष्य जिन्हें भारतभूमि में जन्म प्राप्त हुआ है। क्योंकि हिन्दू जीवन दृष्टि में भारतभूमि ऐसी पवित्र कर्मभूमि है जहाँ मनुष्य न केवल स्वर्ग की प्राप्ति कर सकता है, बल्कि मोक्ष का भी अधिकारी बन सकता है। इसलिए देवता भी अपने देवत्व का भोग समाप्त होने पर पुनः भारत में मनुष्य जन्म पाने की इच्छा रखते हैं, ताकि कर्म करके परम मुक्ति प्राप्त कर सकें। इस श्लोक में भारतवर्ष को केवल जन्मभूमि नहीं, बल्कि कर्मभूमि कहा गया है।


सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥48॥


 देवताओं के लोक भोगभूमि हैं, जहाँ मुख्यतः पूर्वकृत पुण्यों का फल भोगा जाता है; जबकि भारतभूमि वह स्थान है जहाँ पुरुषार्थ, साधना, धर्म, ज्ञान और भक्ति के द्वारा मोक्ष तक पहुँचा जा सकता है। इसीलिए देवता भी भारत, जिसकी स्थिति ऐसी है कि अनेक शक्तियाँ उसके सामर्थ्य, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक प्रभाव को सहज रूप से स्वीकार नहीं करना चाहतीं। अनेक लोग और राष्ट्र भारत की विशाल अर्थव्यवस्था, व्यापार,ज्ञान, प्रतिभा और संसाधनों से लाभ तो लेना चाहते हैं, परंतु  उसको आत्मनिर्भर, शक्तिशाली और विश्व में अग्रणी भूमिका निभाते हुए नहीं देख सकते,में मनुष्य-जन्म को अपने देवत्व से अधिक श्रेष्ठ मानते हैं।

इसी जीवन-दृष्टि का सजीव स्वरूप श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के चरित्र में दिखाई देता है। भगवान श्रीराम ने कभी सुख, वैभव या अधिकार को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया उन्होंने धर्म और कर्तव्य को सर्वोपरि रखा। आजकल हम लोग मानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥

मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥


अंगद क्रोध में भरकर कहते हैं— "अरे रावण! व्यर्थ की डींगें हाँकते हुए तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आती। हे निर्लज्ज! तू अपने ही कुल का विनाश करने वाला है। ऐसे अधर्म और अहंकार के बाद भी अपने तथाकथित बल पर घमण्ड करता फिरता है; फिर भी तेरी छाती लज्जा से फटती नहीं।"

यह वही कह सकता है जिसे शौर्य और पराक्रम की अनुभूति हो जो अत्यन्त बलशाली हो हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को भी इसी शौर्य पराक्रम की अनुभूति करनी है l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आगे क्या बताया,आचार्य जी ने चम्पत राय जी, होसबोले जी का नाम क्यों लिया, प्रयागराज के अक्षय वट का उल्लेख क्यों हुआ, कौवा रोर क्या है, ९ वीं कक्षा में किसके प्रवेश की चर्चा हुई जानने के लिए सुनें l