5.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८३


 हमारे भावों के केंद्र में राष्ट्र और समाज हों तथा हम अपने भावों का विस्तार व्यक्तिगत हित से ऊपर उठाकर लोकमंगल तक करें इससे हमारा जीवन यशस्वी बनेगा l जब हम अपने जीवन को समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित करेंगे तो हमारी  कीर्ति चिरस्थायी होगी l हम अत्यन्त मूल्यवान रत्न होंगे l



आचार्य जी विशेष रूप से श्रीरामचरितमानस के उन प्रसंगों का उल्लेख करते हैं, जो हमारे भीतर उत्साह, आत्मविश्वास, धैर्य, साहस, पुरुषार्थ, कर्तव्यनिष्ठा तथा राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत करें । उनके अनुसार मानस केवल भक्ति का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को जाग्रत , संगठित और कर्मयोगी बनाने वाला प्रेरणास्रोत भी है। इसके पात्र और प्रसंग हमें विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का पालन करते हुए निर्भय होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। जैसी निर्भयता अंगद ने प्रकट की 


"राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा॥"


रावण के दरबार में जब अंगद  जिनके लिए प्रसिद्ध है कि 


रोप्यौ पाँव पैज कै बिचारि रघुवीरबल,

⁠लागे भट सिमिटि न नेकु टसकतु है।

तज्यौ धीर धरनि, धरनिधर धसकत,

⁠धराधर धीर भार सहि न सकतु है॥

महाबली बालि को दबत दलकतु भूमि,

⁠तुलसी उछरि सिंधु मेरु मसकतु है।

कमठ कठिन पीठि, घठा परो मंदर को,

⁠आयो सोई काम, पै करेजो कसकतु है॥


रावण को समझा रहे थे, तब अहंकारी रावण  नर लीला कर रहे भगवान श्रीराम को केवल एक साधारण मनुष्य मानता था। इस पर अंगद उसे तीव्र फटकार लगाते हुए कहते हैं— "अरे मूर्ख रावण! तू किस आधार पर श्रीराम को साधारण मनुष्य समझता है? यदि केवल बाह्य रूप देखकर निर्णय करना ही तेरी बुद्धि है, तो क्या कामदेव केवल धनुष धारण करने वाला एक साधारण धनुर्धर है? और क्या गंगाजी केवल एक सामान्य नदी हैं? जिस प्रकार कामदेव और गंगा का महत्त्व उनके बाह्य रूप से कहीं अधिक है, उसी प्रकार श्रीराम भी सामान्य मनुष्य नहीं, स्वयं परमब्रह्म हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को न पहचानना ही तेरे अज्ञान और अहंकार का प्रमाण है।"


रामत्व, रामात्मकता  अध्यात्म और शौर्य का अद्भुत सम्मिलन है। अध्यात्म मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर आत्मबोध की ओर ले जाता है और शौर्य उसे अन्याय, अधर्म तथा अत्याचार के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़े होने की प्रेरणा देता है।

श्रीराम के जीवन में करुणा और पराक्रम, विनम्रता और वीरता, तप और तेज, नीति और शक्ति सभी का समन्वय दिखाई देता है। यही समन्वय रामत्व की पहचान है। इसलिए राम का अनुसरण केवल पूजा नहीं, बल्कि ऐसे जीवन का निर्माण है जिसमें आत्मोन्नति और लोककल्याण साथ-साथ चलते हैं। जो भय और भ्रम में जीते हैं, वे रामत्व का पूर्ण अनुभव नहीं कर सकते।अनेक दुविधाओं में उलझा मन न तो दृढ़ निर्णय ले पाता है और न ही धर्म के मार्ग पर अडिग रह सकता है।

इसके अतिरिक्त 

आचार्य जी ने अयोध्या (तत्कालीन फैज़ाबाद) के पूर्व जिलाधिकारी कृष्ण कुमार नायर (के. के. नायर) जो रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख, किंतु अपेक्षाकृत अल्पचर्चित नायकों में से एक थे और जो सन् १९४९ में रामलला के प्राकट्य के समय  फैज़ाबाद के जिलाधिकारी थे। 

(उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा रामलला की प्रतिमा हटाने के निर्देश दिए गए थे, किंतु के. के. नायर ने उन निर्देशों का पालन करने से मना कर दिया। ) का उल्लेख क्यों किया, बैठकों के विषय में आचार्य जी ने क्या परामर्श दिए, ब्रह्मा के वरदान और जनता के वरदान से आचार्य जी का क्या आशय है जानने के लिए सुनें l