यथार्थकथनं यच्च सर्वलोकसुखप्रदम्।
तत् सत्यमिति विज्ञेयमसत्यं तद्विपर्ययः॥
जो कथन वास्तविक हो तथा समस्त लोक के लिए हितकारी और सुखदायक हो, वही सत्य कहलाता है। इसके विपरीत जो हो, वह असत्य है।
(पद्मपुराण क्रियायोगसार अध्याय १६)
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८०२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८४
इस सदाचार वेला के माध्यम से हम उस तत्त्व की प्राप्ति का प्रयास करें जिससे हम दिन भर ऊर्जस्वित रहें
जिसके मन में यह अटूट विश्वास होता है कि उस पर भगवान् की कृपा है, वह कभी अहंकार में चूर नहीं होता। वह अपने बल, बुद्धिमत्ता, सामर्थ्य और उपलब्धियों को अपना नहीं, अपितु भगवान् का अनुग्रह मानता है। वह स्वयं को परमात्मा का अंश समझता है। जब हम उस परम अंशी के अंश हैं, तब न हम दीन हैं, न हीन, हमारे भीतर आत्मगौरव, आत्मविश्वास और विनम्रता का अद्भुत समन्वय रहता है।
यही सनातनधर्मी भाव है। इसी आध्यात्मिक आधार ने हिन्दुत्व को सहस्राब्दियों तक जीवित और जाग्रत रखा है। असंख्य आक्रमणों, संकटों, कष्टों और विपरीत परिस्थितियों के बाद भी इसकी जीवनधारा अविच्छिन्न बनी रही।
इतिहास साक्षी है कि संसार के अनेक देशों की पहचान बदल गई, उनकी सभ्यताएँ परिवर्तित हो गईं, उनके नाम, स्वरूप और सांस्कृतिक आधार तक परिवर्तित हो गए किन्तु भारत आज भी भारत है। उसकी आत्मा, उसका सनातन संस्कार और उसका आध्यात्मिक अधिष्ठान आज भी अक्षुण्ण है। यही सनातन संस्कृति की अमरता और उसकी अद्वितीय जीवनशक्ति का प्रमाण है।
यही सनातनधर्मी दृष्टि हमारी शिक्षा का भी मूलाधार है। इसी के आधार पर विश्वभर में हमें सम्मान प्राप्त हुआ l शिक्षा संस्कार व्यवहार आचार है शिक्षा हमारे जीवन का आधार और साधन भी है शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना या जीविका का साधन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराना, उसके भीतर निहित दिव्यता को जाग्रत करना और उसके चरित्र का निर्माण करना है। ऐसी शिक्षा व्यक्ति को अहंकारी नहीं, उत्तरदायी बनाती है, लोकमंगल के लिए समर्पित बनाती है।
शिक्षा हमें बताती है कि छल से मिश्रित सत्य सत्य नहीं है
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः।
न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति।
न तत् सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्॥
वह सभा सभा नहीं, जहाँ अनुभवी और धर्मज्ञ वृद्ध न हों।
वे वृद्ध भी वास्तविक वृद्ध नहीं, जो धर्म की बात न कहें।
वह धर्म धर्म नहीं, जिसमें सत्य न हो।
और वह सत्य भी सत्य नहीं, जो छल से मिश्रित हो।
अत्यन्तलोकहितं सत्यम्।
श्रीरामचरितमानस में जो सत्य का आख्यान है वह शौर्य और शक्ति के साथ सम्मिश्रित आख्यान है l
सत्य का पालन वही कर सकता है, जिसके भीतर साहस, धैर्य और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा हो।
अंगद का यह प्रसंग इसका उत्कृष्ट उदाहरण है—
भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग।
कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥ 34(ख)॥
अर्थात् जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत अपने मन से नीति का त्याग नहीं करते, वैसे ही अंगद का चरण भूमि से तनिक भी नहीं डिगा और उसे देखकर शत्रुओं का मद चूर हो गया।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ कल सम्पन्न हुई बैठक की चर्चा क्यों हुई सत्य के क्या क्या पर्यायवाची शब्द हैं जानने के लिए सुनें l