7.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८५

हम अपना चिंतन भ्रम और भय से मुक्त रखते हुए सत्य, आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टि से प्रेरित रखें क्योंकि तभी वह राष्ट्र और समाज के लिए कल्याणकारी बनेगा l

जैसे हम अपने शरीर और वस्त्रों की स्वच्छता का ध्यान रखते हैं, वैसे ही अपने विचारों की पवित्रता और सकारात्मकता का भी ध्यान रखना आवश्यक हैl

भारत मल का जोहड़ नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वच्छता, शौर्य और सदाचार का पावन तीर्थ बने अतः राष्ट्रविरोधी तत्त्वों का विधिसम्मत और दृढ़ प्रतिरोध और उनके समक्ष शक्ति और शौर्य का प्रदर्शन आवश्यक है l



हमने अपना लक्ष्य बनाया है 

*राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष*

उस आधार पर हमारे विचार केवल अपने व्यक्तिगत हित तक सीमित नहीं रहने चाहिए।


यद्यपि चिन्तन मानव जीवन का अमृत है 

पर वह यदि सीमाओं में ही अवरुद्ध रहा l

तो समझो उसका हाल वही हो जाता है 

जैसे जल छोटी सीमा बीच निरुद्ध बहा ll 



 जब हमारा चिंतन देश, समाज और समष्टि के कल्याण से संयुत होता है, तभी वह वास्तव में सार्थक और जीवनदायी बनता है। यदि हम केवल अपने परिवार या निजी स्वार्थ तक ही सोचते रहें, तो वह चिंतन संकीर्ण है। ऐसा सीमित चिंतन समाज की उन्नति में अपेक्षित योगदान नहीं दे पाता।

संकीर्ण और स्वार्थपरक विचार भी  समाज और राष्ट्र के विकास में सहायक नहीं बनते। इसके विपरीत, जब विचारों का विस्तार समाज,राष्ट्र, संस्कृति, मानवता और लोकमंगल तक होता है, तब वही चिंतन समाज में जागरण, संगठन, सेवा और प्रगति का आधार बनता है। व्यापक चिंतन ही हमें यशस्वी बनाता है और राष्ट्र को शक्तिशाली एवं समृद्ध बनाने में योगदान देता है।

ऐसा ही व्यापक, निर्भय और लोकमंगलकारी चिंतन गोस्वामी तुलसीदास जी का था। श्रीरामचरितमानस, जो हर संकट में हमें मार्ग दिखा देता है,में  भगवान श्रीराम व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना, सज्जनों की रक्षा और अधर्म के उन्मूलन के लिए कार्य करते हैं। आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥

अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥2॥


हे बालि के पुत्र! मुझे जानने का बड़ा कौतूहल है कि जो रावण राक्षसों के कुल का तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबल की संसार भर में धाक है उसके  मुकुट तुमने कैसे उतार दिए l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने क्या बताया 

श्री हरि ओम पवार जी,कवयित्री व्याख्या मिश्रा जी, भैया पवन जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l