अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥
लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहिं सिंधु दुइ मंदर जैसें॥४॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अष्टमी / नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८०४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८६
हमारे भीतर अनेक विचार, भाव, प्रतिभाएँ और संकल्प होते हैं। यदि वे केवल मन में ही रह जाएँ और व्यवहार, वाणी या कर्म के रूप में प्रकट न हों, तो उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।अतः आइए, हम अपने भावों, विचारों और संकल्पों को अभिव्यक्त करें तथा उन्हें कर्मरूप में परिणत कर जीवन को सार्थक बनाएँ।
आजकल हम लोग मानस के लंकाकांड में प्रविष्ट हैं
सेतुनिर्माण के पश्चात् अंगद की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाती है l
अंगद केवल भगवान श्रीराम के दूत बनकर नहीं गए थे, बल्कि एक कुशल दूत, नीतिज्ञ और गुप्तचर के रूप में भी कार्य कर रहे थे। उन्होंने रावण को धर्म का उपदेश दिया, उसकी शक्ति और अहंकार का परीक्षण किया, सभा का मनोभाव समझा और लौटकर लंका की सैन्य एवं दुर्ग-व्यवस्था का पूरा विवरण श्रीराम को सुनाया।
श्रीराम अंगद की चतुराई और नीति-कौशल से प्रसन्न होकर मुस्कुराए। इसके बाद अंगद ने लंका के चारों द्वारों, रक्षा-व्यवस्था, सेना की तैनाती तथा युद्ध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सभी सूचनाएँ विस्तार से प्रस्तुत कीं।
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए॥
लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा॥1॥
जब श्रीराम को शत्रु (रावण) के विषय में समाचार प्राप्त हुआ, तब उन्होंने अपने सभी मंत्रियों और प्रमुख सहयोगियों को अपने समीप बुलाया। फिर उन्होंने कहा— "लंका के चारों द्वार अत्यन्त सुदृढ़ और सुरक्षित हैं। बताइए, किस प्रकार आक्रमण किया जाए? इस विषय में आप सब विचार करें।"
महान नेतृत्व का लक्षण यह है कि वह अहंकारवश अकेले निर्णय नहीं लेता, बल्कि योग्य साथियों से विचार-विमर्श कर उचित नीति का निर्धारण करता है।
नेतृत्व का एक प्रमुख दायित्व अपने अनुयायियों के हृदय में यह अटूट विश्वास स्थापित करना है कि उनका नायक प्रत्येक चुनौती का सामना करने में पूर्णतः समर्थ है और विजय निश्चित है। यही विश्वास उनके भीतर उत्साह, साहस, पराक्रम और अडिग मनोबल का संचार करता है तथा उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण के साथ कर्मक्षेत्र में प्रवृत्त करता है l
श्रीराम ने अपने प्रताप, सामर्थ्य और विजय के प्रति सबको आश्वस्त करते हुए वानर-सेना का उत्साहवर्धन किया और उन्हें उचित प्रकार से समझाया। प्रभु के वचनों को सुनते ही वानर वीरों के हृदय में अद्भुत उत्साह और आत्मविश्वास जाग उठा। वे सिंहनाद करते हुए पूर्ण पराक्रम के साथ युद्ध के लिए दौड़ पड़े।
आगे आचार्य जी ने क्या बताया साकेत में भगवान राम को रामानन्दी मैथिलीशरण गुप्त ने किस रूप में प्रकट किया, भैया शुभेन्दु शेखर जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l