19.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२७

 यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४६ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२८


हम अपने भीतर यह अनुभव करें कि हम समाज में अपने आचरण, ज्ञान, सेवा, प्रेम, आत्मीयता और कर्तव्यनिष्ठा के कारण इतने विश्वसनीय और सम्माननीय बन गये हैं कि लोग हमारे बड़प्पन को स्वीकार कर रहे हैं और मार्गदर्शन एवं परामर्श के लिए स्वयं हमारे पास आ रहे हैं ।



आज राष्ट्र की प्रगति के मार्ग में अनेक प्रकार के झंझावात दिखाई दे रहे हैं। कहीं राष्ट्र की एकता और अखण्डता को प्रभावित करने के प्रयास हो रहे हैं, तो कहीं सनातन धर्म के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का वातावरण बनाया जा रहा है। ऐसे समय में हम राष्ट्रभक्त सनातनधर्मियों का दायित्व और भी बढ़ जाता है। 

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥


हमें अध्यात्म के कारण जगप्रपंच को त्यागना नहीं है l इसी कारण शौर्यप्रमंडित अध्यात्म महत्त्वपूर्ण है l हमें मनुष्यत्व की अनुभूति करते हुए पुरुषार्थ प्रदर्शित करना है l यदि हमारा उद्देश्य लोगों को सनातन धर्म के वैशिष्ट्य, उसकी उदात्त जीवन-दृष्टि,यज्ञमयी संस्कृति,शाश्वत मूल्यों और समृद्ध परम्परा से परिचित कराना है तथा समाज में राष्ट्रनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य-बोध को जाग्रत करना है, तो केवल व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए हमें संगठित होकर कार्य करना होगा।

एक व्यक्ति की क्षमता सीमित हो सकती है, किन्तु जाग्रत, समर्पित और संस्कारित व्यक्तियों का संगठन व्यापक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। इसलिए आज आवश्यकता केवल यह सोचने की नहीं कि “कोई कुछ करे”, बल्कि यह समझने की है कि “मुझे क्या करना है और मैं अपने साथ कितने लोगों को जोड़ सकता हूँ।”

 हमें अपने कर्तव्य का बोध करना ही होगा। हमें लोगों के भीतर जड़ जमाए पराधीनता के भाव को समाप्त कर स्वाभिमान, आत्मविश्वास और नेतृत्व का भाव जाग्रत करना है। हमें स्वयं जाग्रत होना होगा, दूसरों को जाग्रत करना होगा और ऐसे व्यक्तियों का संगठन खड़ा करना होगा जो राष्ट्र, समाज और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पित भाव से कार्य कर सकें l राष्ट्र, समाज और सनातन संस्कृति को लाभ पहुंचा सकें जिस प्रकार का लाभ  गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के माध्यम से  हमारे भीतर के सनातनत्व को हिन्दुत्व को जाग्रत कर पहुंचाया l


सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन॥

मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥3॥

आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिए, जिसमें श्री रामचंद्रजी सिंहासन पर विराजमान हों। वशिष्ठ मुनि के सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणों को बहुत ही अच्छा लगा ॥3॥


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया आचार्य जी को एक महिला ने किस कारण फोन किया था,लाइजनिंग का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l