कर्म के सिद्धान्त जब व्यवहार बनकर दीखते हैं
तब भविष्यत् के सभी अंकुर सहज ही सीखते हैं
और जब सिद्धान्त केवल सूत्रवत् रटवाए जाते
तभी प्रवचन मंत्र सारे व्यर्थ यों ही फड़फड़ाते l
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८४५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२७
यदि हमारा अन्तःसुख समाज-सेवा और भारतमाता की सेवा में समाहित हो जाए, तो इससे बढ़कर हमारे लिए आनन्द और सौभाग्य का विषय क्या हो सकता है!
हम पहले स्वयं सनातन धर्म की विशेषताओं से परिचित हों l भयों और भ्रमों में व्याकुल न हों l साथ ही नई पीढ़ी को भी सनातन धर्म के वैशिष्ट्य, उसकी उदात्त जीवन-दृष्टि, शाश्वत मूल्यों और समृद्ध परम्परा से परिचित कराना आज की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति अथवा धार्मिक अनुष्ठानों का नाम नहीं, बल्कि जीवन को सत्य, धर्म,पौरुष,शौर्य, पराक्रम,करुणा,शील,संयम, कर्तव्य, त्याग और लोकमंगल की भावना से जीने की व्यापक जीवन-पद्धति है।
हम वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता, मानस तथा अन्य ज्ञान-परम्पराओं में निहित जीवन-दर्शन से परिचित हों ताकि हम अपनी संस्कृति को केवल परम्परा के रूप में न जाने, बल्कि उसके पीछे निहित वैज्ञानिक, नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय दृष्टि को समझ सकें ।श्रीरामचरितमानस एक अद्भुत ग्रंथ है l यह पुण्य रूप, पापों का हरण करने वाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देने वाला, माया मोह और मल का नाश करने वाला, परम निर्मल प्रेम रूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका अवगाहन करते हैं उन्हें सांसारिक व्यथाएं सताती नहीं हैं वे अपने विकारों को दूर करने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं और ऊर्जस्वित, उत्साहित हो जाते हैं l
कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया,मधुमक्षिका वृत्ति क्या है,जुगल देवी विद्या मन्दिर और जय नारायण विद्या मन्दिर की चर्चा क्यों हुई, मानस रामायण किसके द्वारा रचित है जानने के लिए सुनें l