21.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३०

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४८ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३०

जो महापुरुष हमें आकर्षित करे हम उसके पथ पर चल दें 

महाजनो येन गतः स पन्था।।



हमारे भीतर एक अद्भुत शक्ति विद्यमान है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने और उस पर विश्वास करने की है। जिस क्षण हमें अपने भीतर निहित उस शक्ति का बोध हो जाता है, उसी क्षण हमारे भीतर आत्मविश्वास जाग उठता है। तब हम परिस्थितियों से भयभीत नहीं होते, बल्कि उनका सामना करने का सामर्थ्य अपने भीतर अनुभव करते हैं। ऐसा ही सामना करने का सामर्थ्य वीर हकीकत राय (१७१९–१७३४) ने दिखाया जो भारत के एक अप्रतिम निर्भीक धर्मनिष्ठ महापुरुष थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के अपमान का दृढ़तापूर्वक प्रतिकार किया। उन पर इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाला गया, किन्तु उन्होंने अपने धर्म और आस्था से विचलित होना स्वीकार नहीं किया। धर्म परिवर्तन के स्थान पर उन्होंने मृत्यु का सहर्ष वरण किया और अपने अदम्य शौर्य , आत्मसम्मान तथा धर्मनिष्ठा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।हम धर्म, अधर्म, विधर्म, कर्म, अकर्म और विकर्म का भेद जानें—कौन-सा आचरण धर्मसम्मत है, कौन अधर्म है, अपने कर्तव्य से विचलन क्या है, कर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है, कर्म में अकर्म की स्थिति क्या है तथा निषिद्ध एवं धर्मविरुद्ध कर्म को विकर्म क्यों कहा गया है—यह समझना आवश्यक है।

श्रीरामचरितमानस हमारे भीतर आत्मविश्वास जाग्रत करता है हमें आनन्दित करने का यह एक अद्भुत ग्रंथ है l हम भी इस संसार में जहां देवासुर संग्राम सतत चल रहा है अपने सनातनधर्मी राष्ट्रभक्त बन्धुओं में आत्मविश्वास जाग्रत करें 


साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय ll 


रावण-वध के पश्चात् भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे। अयोध्यावासियों के हृदय में वर्षों से संचित प्रतीक्षा अब पूर्ण होने वाली थी।भगवान श्रीराम के वनवास की अवधि समाप्त हो चुकी थी और उनके लौटने से सम्पूर्ण अयोध्या आनन्द से भर उठी।

भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की भव्य तैयारियाँ आरम्भ हुईं। गुरु वसिष्ठ सहित समस्त मुनि, ब्राह्मण और अयोध्या के श्रेष्ठ जन इस मंगल अवसर के लिए एकत्र हुए। राजमहल में उत्सव का वातावरण था और माता कौसल्या सहित सभी माताएँ अपने प्रिय राम को राजा के रूप में देखने के लिए अत्यन्त हर्षित थीं।

इसी मंगलमय अवसर पर गुरु वसिष्ठ ने विधिपूर्वक श्रीराम का राज्याभिषेक आरम्भ किया—



प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा॥

सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी॥3॥

कथा में आगे आचार्य जी क्या कह रहे हैं,घुनाक्षर न्याय क्या है, ISKCON का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया, Gen Z का उल्लेख क्यों हुआ, अंगद कहां बांधा जाता है जानने के लिए सुनें l