22.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 22 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३१

 जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं॥

अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥1॥


दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा॥

रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 22 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३१

आत्म-साक्षात्कार इसलिए कठिन है कि मन, बुद्धि और अहंकार आदि की परतें हमारे वास्तविक स्वरूप को ढँके रहती हैं। जब तक इनसे तादात्म्य समाप्त नहीं होता, तब तक आत्मा का साक्षात्कार सहज नहीं हो पाता। मन, बुद्धि, अहंकार आदि से तादात्म्य समाप्त करने के लिए हमें ये सदाचार संप्रेषण सुनने चाहिए l

अपने राष्ट्र भारत के प्रति निष्ठावान बनें और उसे वैभव-संपन्न, शक्तिशाली एवं समृद्ध बनाने में अपना योगदान दें। भारत का उत्थान सम्पूर्ण विश्व का प्राण-तत्त्व  है।



जब हम श्रीरामचरितमानस के बाहरी कथानक तक सीमित न रहकर उसके भीतर अवगाहन करेंगे, उसके भावों और जीवन-सन्देशों को आत्मसात् करेंगे, तभी उसके वास्तविक आनन्द की अनुभूति कर सकेंगे।


भगवान श्रीराम की व्यथाओं की कथा हमें अश्रुपूरित कर देती है ; किंतु यदि वही व्यथाएँ हमारे जीवन में आ जाएँ, तो हम निश्चित रूप से भीतर से टूट जाएँगे । श्रीराम का जीवन हमें यही सिखाता है कि व्यथाओं से बचना ही जीवन नहीं, बल्कि धैर्य, मर्यादा, शौर्य, पराक्रम और धर्म के साथ उसका सामना करना ही जीवन की सच्ची साधना है।


अपनी व्यथाओं को स्वयं तक सीमित न रखकर उन्हें दूसरों के लिए प्रेरणादायी कथा बना देने के कारण ही  इस मर्त्यलोक में नर का अभिनय करते हुए प्रभु श्रीराम विशेष हो गए l


प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।

मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा॥2॥

कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया,परस्पर का भाव क्या है, हमारी आत्मीयता कैसे झलक सकती है जानने के लिए सुनें l