प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८५० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३२
परमात्मा हमें निर्देश दे रहा है कि हम अपनी क्षमताओं, सामर्थ्य, बुद्धि और अनुभव को अपनी नई पीढ़ी को सौंपें, ताकि वह भी इनका सदुपयोग करते हुए राष्ट्र और समाज को आगे ले जा सके।
हम संसार के कर्मों और अपने धर्म का यथाशक्ति, यथाबुद्धि निर्वाह करते हुए जीवन के पथ पर निरंतर अग्रसर हैं।
आचार्य जी प्रयास कर रहे हैं कि आचार्य जी केवल पढ़ाने वाले और हम केवल पढ़ने वाले न होकर एक ही यात्रा के सहयात्री बनें । हम दोनों के बीच विश्वास, सहयोग, प्रेम और सद्भाव बना रहे अध्ययन तप, पुरुषार्थ और सामूहिक प्रयत्न से सार्थक हो l
संसार निरंतर गतिशील है। हमें भी समय और परिस्थितियों के अनुरूप विवेकपूर्वक आगे बढ़ते रहना चाहिए। यदि हमारी गति सम्यक् दिशा में और उचित रीति से होगी, तो हम निश्चित ही अपने लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे और हमारा लक्ष्य है कि भारत वैभवसंपन्न बने क्योंकि भारत का वैभव केवल भारत की उन्नति नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का आधार है। और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हम विपरीत परिस्थितियों से विचलित न हों
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम जिनमें त्याग की पराकाष्ठा एक ओर थी तो दूसरी ओर शौर्य का चरमोत्कर्ष और जिनको तुलसीदास जी किसी का अवतार न मानते हुए स्वयं परमात्मा स्वरूप कहते हैं और इस प्रकार व्यक्त करते हैं
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने॥
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे॥5॥
वेद-शास्त्र जिस संसार को एक विशाल वृक्ष के रूप में देखते हैं, उसका मूल अव्यक्त प्रकृति में है और वह प्रवाह की दृष्टि से अनादि है। उसकी चार त्वचाएँ, छह तने, पच्चीस शाखाएँ तथा असंख्य पत्ते और पुष्प हैं। इस संसार-वृक्ष पर सुख और दुःख के प्रतीक दो प्रकार के फल—मीठे और कड़वे लगते हैं। उस वृक्ष पर एक ऐसी लता भी है, जो उसी के आश्रय से विकसित होती रहती है। इसमें नित्य नए पत्ते और पुष्प उत्पन्न होते रहते हैं। ऐसे निरंतर परिवर्तनशील, विविध रूपों में प्रकट इस संसार-वृक्षस्वरूप परम सत्ता को हम नमस्कार करते हैं
के जीवन के माध्यम से हमें यही संदेश दिया है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विपरीत क्यों न हों, धर्म, मर्यादा और लोककल्याण के पथ से विचलित हुए बिना निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। हमें ढोल मजीरा बजाते हुए बैठना नहीं है नाप जपें तो उसका प्रभाव भी हमारे ऊपर हो यही शौर्यप्रमंडित अध्यात्म है l
कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया भैया अशोक सिंह जी द्वारा गाए जाने वाले अवधी गीत का उल्लेख क्यों किया, भैया पंकज श्रीवास्तव जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l