5.2.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 05/02/2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है सुपथ -समीरण आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 05/02/2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




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हम संसार से संयुक्त रहकर संसार से मुक्त होने का प्रयास करते हैं l सहज विषयों को लेकर उसमें से तात्त्विक अंशों को छांटना सदाचार का रूप धारण कर लेता है इसी से हमारे संपर्क संयुत होते हैं संबन्ध बनते हैं समाज सेवा का संतोष मिलता है


समाज सेवा हमारे सदाचार का मूल आधार है हम समाज, वाणी, प्रकृति, विचार आदि को देवता समझते हैं l यह देवत्व भाव परमात्मा की कृपा है


मन में सात्विकता होने पर व्यवधान आने पर हमें उपाय सूझते हैं न कि हम खीझते हैं


आज हम लोग सरस्वती पूजन भी करते हैं सरस्वती एक नदी भी है सरस्वती की खोज  डा बाकणकर के प्रयासों से संभव हो सकी

हमारा वैदिक ज्ञान सरस्वती नदी के तट पर उत्पन्न हुआ है



मां सरस्वती को हम लोगों ने देवी माना हम लोगों को निम्नांकित प्रार्थना अवश्य करनी चाहिये


या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ll


आज 1719 में  जन्मे हकीकतराय का बलिदान दिवस भी है जिन्हें बसंत पञ्चमी के दिन 1734 में इस्लाम न स्वीकारने पर फांसी दे दी गई


हमारा तो प्रयास रहता है कि जो सभ्यताएं क्रूरता का आधार लिये विकसित हुई हैं उनको रास्ते पर ले आयें


आचार्य जी ने यह भी स्पष्ट किया कि हम विश्वगुरु कैसे बने


आचार्य जी से हमें तात्त्विकता प्राप्त करनी चाहिये


मनुष्यत्व को प्राप्त करने के लिये कोई गुरु न मिले तो अपने भीतर ही गुरु को खोजें

4.2.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 04/02/2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है शुद्धभाव आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 04/02/2022

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(कल टेलीविजन पर  काशी में  हो रहे एक कार्यक्रम के सजीव प्रसारण में एक वक्ता श्री गिरीश चन्द्र त्रिपाठी जी बोले अब समय की मांग है कि संत समाधि -कक्ष से बाहर आयें )


आचार्य जी का कहना है हम लोगों को तात्त्विक चर्चा भी करनी चाहिये,तात्त्विक चर्चा में प्रश्नोत्तर अत्यन्त आवश्यक हैं और इसका कोई कार्यक्रम होना चाहिये

आचार्य जी ने कल की एक घटना की चर्चा की जिसमें ओवैसी पर हमला हुआ इस तरह का हमला निन्दनीय है



किसी पर गोली चलाना उसके विचारों का समापन नहीं है विचार को विचार से काटना व्यवहार को व्यवहार से जीतना और जहां संघर्ष है वहां संघर्ष करके विजय प्राप्त करनी चाहिये


कहां तनबल की आवश्यकता है कहां संयम -बल की कहां विचार -बल की इसके लिये हमारे यहां सदाचार में कहा गया है

श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः | सम्यक् संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् |

भारत वर्ष का चिन्तन कहता है यह परमात्मा की शक्ति है जो सृष्टि की रचना करती है



सृष्टि कैसे बनी आदि रहस्य भौतिक विज्ञान द्वारा  सुलझ नहीं  सकते उसके लिये अध्यात्म ज्ञान की आवश्यकता होती है

छह वेदांगों में एक है कल्प, कल्प में यज्ञ विधानों के वर्णन के साथ सूत्र ग्रन्थ भी हैं


हमारा बचा हुआ साहित्य ग्रंथागार किसी भी तरह से कम नहीं है हमें इस ओर अपनी दृष्टि रखनी चाहिये 


आचार्य जी चाहते हैं हम यशस्वी नागरिक बनें l

3.2.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 03/02/2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है विश्रब्ध आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 03/02/2022

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सर्वप्रिय भैया अशोक त्रिपाठी (बैच 1988) को केन्द्र में रखकर आज आचार्य जी ने हम लोगों को प्रेरित किया



 आचार्य जी  हम लोगों को आप कहकर क्यों संबोधित करते हैं यह उन्होंने स्पष्ट किया  l सामाजिक मर्यादाओं में बंधकर तुम /तू शब्द आप हो जाता है l


भैया अशोक त्रिपाठी को हाल ही में बहुत कठिन कष्टकारी क्षणों से गुजरना पड़ा था जब उनकी धर्मपत्नी और पिता जी एक दिन के अन्तराल में संसार त्यागकर चले गये थे l आचार्य जी ने उन्हें ढाढस बंधाया l कोरोना काल ने हमारे बहुत से आत्मीय जनों को विकराल रूप धारण कर लील लिया था l जब जीवात्माओं में मन भटकता है तो मन अत्यधिक भावुक हो जाता है l 

किसी स्थान के मोह की अभिव्यक्ति के बारे में आचार्य जी ने बताया l

इसके बाद आपने ऋग्वेद (5/82/5)की एक प्रार्थना

ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ।

यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥

की व्याख्या की


समस्त संसार को उत्पन्न करने वाले (सृष्टि-पालन-संहार करने वाले) विश्व में सर्वाधिक देदीप्यमान एवं जगत को शुभकर्मों में प्रवृत्त करने वाले हे परब्रह्मस्वरूप सवितादेव! आप हमारे सभी आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक बुराइयों व पापों को हमसे दूर, बहुत दूर ले जाएं; और जो कल्याणकारी हों उन्हें हमारे पास रख दें


हम भ्रमित हुए अस्ताचल वाले देशों को जब देखा

को याद दिलाकर आचार्य जी ने कहा कि उस भ्रम और भय को त्याग कर हमें आत्मचिन्तन करना चाहिये l

जागरण शयन ध्यान धारणा अध्ययन स्वाध्याय संगति खानपान सभी सही हों इसका ध्यान दें

2.2.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 2/2/22 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है विकिरण -प्रहि आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 2/2/22

  का  सदाचार संप्रेषण जिसे समीक्षातीत अत्यन्त दिव्य प्रसाद समझकर हमें ग्रहण करना चाहिये यह हमें प्रेरित करने के लिये है 




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धर्मज्ञ होना तो बहुत कठिन है लेकिन धर्माचारी होना आसान है


विद्यालय में जन्माष्टमी के बाद छठी उत्सव होता था, पारंपरिक रूप से बैरिस्टर साहब के घर पर भी यह उत्सव होता था जहां किसी विद्वान की कथा और दिव्य प्रसाद का वितरण उल्लेखनीय बात थी


आचार्य जी ने स्कन्द पुराण में  परमात्मा की एक दिव्य प्रार्थना का उल्लेख किया पुराणों के क्रम में स्कंद पुराण का 13 वां स्थान है। आकार की दृष्टि से यह सबसे बड़ा पुराण है। इसमें स्कंद (कार्तिकेय ) द्वारा शिवतत्व का वर्णन है।इसमें तीर्थों के उपाख्यानों और उनकी पूजा-पद्धति का भी वर्णन है। 'वैष्णव खंड' में जगन्नाथपुरी की और 'काशीखंड' में काशी के समस्त देवताओं, शिवलिंगों का आविर्भाव आदि बताया गया है। 'आवन्यखंड' में उज्जैन के महाकलेश्वर का वर्णन है।'सत्यनारायण व्रत' की कथा इसके 'रेवाखंड' में मिलती है।

आचार्य जी ने कहा हत्या हत्या ही है चाहे दीनदयाल जी को हो या गांधी जी की

हत्या और युद्ध में अन्तर है धोखे से ही गांधी जी को भी मारा गया


भारत वर्ष में त्याग की पूजा होती है भोग की नहीं



राधेश्याम खेमका जी, हनुमान प्रसाद पोद्दार जी आदि अवतार ही हैं इन अवतारों की अनुभूति करने का कुछ देर भी प्रयास करेंगे तो भारत देश के प्रति श्रद्धा भक्ति समर्पण सब कुछ आ जायेगा


भारत की शक्ति और भक्ति की वृद्धि के लिये जो भी प्रयास करेगा वो हमारा ही आदमी मान लिया जायेगा

उत्साह से ही समस्याओं का सामना करें

1.2.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 01/02/2022 का सदाचार संप्रेषण

 श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥(नवधा भक्ति )


प्रस्तुत है चित्रकथालापसुख आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 01/02/2022

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यह भावमय संसार अद्भुत है भाव हम सब के अंदर होते हैं

किसी के सुप्त किसी के अव्यवस्थित तो किसी के मार्गान्तरित भी हो सकते हैं, इस भावभूमि का संस्पर्श हम सबको करना चाहिये


मानस में अरण्यकांड में शबरी के आश्रम के बारे में, शबरी द्वारा बेर खिलाना आदि को अनेक ग्रन्थों में विस्तार से बताया गया है


कथावाचकों ने ऐसे भाव व्यक्त किये हैं ताकि हमारे अन्दर वो भावानुभूति हो जाये

कथाएं मन के भाव से संयुत होती हैं, कथाएं इतिहास नहीं होती हैं


कथाओं और साहित्य में इतिहास ढूंढने  का हमें प्रयास नहीं करना चाहिये इतिहास और साहित्य एक दूसरे से गुंथे होते हैं अपने विवेक से हमें उनका विश्लेषण करना चाहिये

इन कथाओं में कुछ ऐसे अंश संयुत हैं जो अपने भाव जाग्रत करने के लिये हैं और तर्कातीत हैं


साहित्यकार को आसपास का पर्यावरण प्रभावित करता है  वह अकबर का ही  समय था जब तुलसी का जन्म हुआ उस समय महिलाओं के बाजार लगते थे स्त्री - स्वातन्त्र्य विचार असंभव था


अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥2॥


जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥

भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥3॥

की व्याख्या में आचार्य जी ने बताया कि भक्तिहीन मनुष्य उसी तरह होता है जैसा जलविहीन बादल

भक्ति ऐसी शक्ति है कि मनुष्य उसे यदि पहचान ले तो सर्वस्व प्रदान कर सकती है


कुछ राष्ट्र -भक्ति के दास हैं कुछ ईश्वर -भक्ति के दास हैं इसी तरह वैराग्य -भक्ति के भी दास होते हैं


नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥4॥



गुर पद पकंज सेवा तीसरि भगति अमान।

चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।। 


मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।

पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।


छठ दम सील बिरति बहु करमा।

निरत निरंतर सज्जन धरमा।।


सातवँ सम मोहि मय जग देखा।

मोतें संत अधिक करि लेखा।।


आठवँ जथालाभ संतोषा।

सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।


नवम सरल सब सन छलहीना।

मम भरोस हियँ हरष न दीना।।

इस तरह  भक्ति के नौ प्रकार हैं

आचार्य जी ने इसके अतिरिक्त राजेश्वरनन्द जी महाराज की भी चर्चा की