प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१९०३ वां* सार -संक्षेप
परमात्मा का तो कहना ही क्या!
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥
उसने इस सृष्टि में इतने विधि-विधान, इतने आकर्षण और इतनी विविधताएँ रच दी हैं कि मनुष्य उनमें रमकर अपने जीवन के मूल उद्देश्य को ही भूल जाता है। वह बाहरी संसार में सुख, शान्ति और तृप्ति खोजता रहता है, जबकि परमात्मा तो उसके भीतर ही अवस्थित है। इसका एक गहरा भाव यह है कि हमारा शरीर केवल शरीर नहीं, परमात्मा की उपस्थिति का पवित्र मन्दिर है। इस कारण अपने भीतर की शुद्धि के प्रति हमारा उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है। हमें अपने अन्तःकरण को काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, द्वेष आदि से दूषित होने से बचाना चाहिए क्योंकि विकृत मार्ग पर चलना केवल अनुचित कर्म नहीं रह जाता, बल्कि अपने ही भीतर प्रतिष्ठित पवित्रता का अनादर बन जाता है l
मन पछितैहै अवसर बीते।
दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥1॥
-तुलसीदास
ऐसी है हमारे यहां की ज्ञान -गरिमा इस ज्ञान -गरिमा के आधार पर जो मनुष्य आत्मज्ञानसंपन्न होकर हमारा मार्गदर्शन करते हैं वे ही महान् जन हैं
महाजनो येन गतः स पन्थाः
हमें स्वीकार करना चाहिए कि जीवन की शक्तियाँ, बुद्धि, सामर्थ्य और अवसर केवल हमारे निजी उपभोग के लिए नहीं, बल्कि किसी उच्चतर उद्देश्य की पूर्ति के लिए हैं l
कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया,अवलीया (औलिया ) का उल्लेख क्यों हुआ,जिल्दसाज क्या नहीं समझते जानने के लिए सुनें l