15.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१९०३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१९०३ वां* सार -संक्षेप

परमात्मा का तो कहना ही क्या! 


अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।

स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्‌॥


उसने इस सृष्टि में इतने विधि-विधान, इतने आकर्षण और इतनी विविधताएँ रच दी हैं कि मनुष्य उनमें रमकर अपने जीवन के मूल उद्देश्य को ही भूल जाता है। वह बाहरी संसार में सुख, शान्ति और तृप्ति खोजता रहता है, जबकि परमात्मा तो उसके भीतर ही अवस्थित है। इसका एक गहरा भाव यह है कि हमारा शरीर केवल शरीर नहीं, परमात्मा की उपस्थिति का पवित्र मन्दिर है। इस कारण अपने भीतर की शुद्धि के प्रति हमारा उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है। हमें अपने अन्तःकरण को काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, द्वेष आदि से दूषित होने से बचाना चाहिए क्योंकि विकृत मार्ग पर चलना केवल अनुचित कर्म नहीं रह जाता, बल्कि अपने ही भीतर प्रतिष्ठित पवित्रता का अनादर बन जाता है l


मन पछितैहै अवसर बीते।

दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥1॥  

-तुलसीदास

ऐसी है हमारे यहां की ज्ञान -गरिमा इस ज्ञान -गरिमा के आधार पर जो मनुष्य आत्मज्ञानसंपन्न होकर हमारा मार्गदर्शन करते हैं वे ही महान् जन हैं 


महाजनो येन गतः स पन्थाः

हमें स्वीकार करना चाहिए कि जीवन की शक्तियाँ, बुद्धि, सामर्थ्य और अवसर केवल हमारे निजी उपभोग के लिए नहीं, बल्कि किसी उच्चतर उद्देश्य की पूर्ति के लिए हैं l 


कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया,अवलीया (औलिया )  का उल्लेख क्यों हुआ,जिल्दसाज क्या नहीं समझते जानने के लिए सुनें l

14.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१९०२ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१९०२ वां* सार -संक्षेप


ज्ञान की गरिमा जब भक्ति में समाहित हो जाती है, तब जीवन में एक अद्भुत आश्वस्ति का अनुभव होता है। ज्ञान हमें सत्य का बोध कराता है और भक्ति उस सत्य के प्रति विश्वास तथा समर्पण का भाव जगाती है। भक्त को यह दृढ़ विश्वास रहता है कि उसका इष्ट ही सब कुछ करने वाला है और वही उसके जीवन का वास्तविक आधार है। इस विश्वास के कारण वह परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, अपितु प्रत्येक परिस्थिति में अपने इष्ट की कृपा का अनुभव करते हुए निश्चिन्त भाव से अपना कर्तव्य करता रहता है। हम भी राष्ट्रहित और समाजहित के कार्य इसी प्रकार करें l


गरुड़ जी को अपने ज्ञान और सामर्थ्य का बोध था, किंतु  भगवान् श्रीराम की मानवीय लीला देखकर उनके मन में संशय उत्पन्न हो गया था। काकभुशुण्डि जी ने उन्हें  यह समझाया कि भगवान् की लीला को केवल तर्क और बुद्धि से नहीं समझा जा सकता; उसके लिए श्रद्धा और भक्ति भी आवश्यक हैं।


सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी॥

तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं॥3॥


(शिव जी कहते हैं-) हे भवानी! भुशुण्डि जी के वचन सुनकर गरुड़ जी हर्षित होकर कोमल वाणी से बोले-

 हे प्रभु! आपकी कृपा से अब मेरे हृदय में संशय, शोक, मोह और भ्रम शेष नहीं रह गए हैं।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, स्वास्थ्य शिविर की चर्चा क्यों हुई आदि जानने के लिए सुनें l

13.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१९०१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१९०१ वां* सार -संक्षेप


निर्मल भाव से निकले विचार हमें अच्छे कामों और समाज के हित की ओर ले जाते हैं। किन्तु जब विचारों का उद्देश्य केवल भौतिक शक्ति पाना, अपना स्वार्थ सिद्ध करना या दूसरों पर प्रभुत्व जमाना हो जाता है, तब भाव की निर्मलता समाप्त होने लगती है। निर्मल भाव बनाए रखने के लिए हमें अपने विचारों और कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। नियमित स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन और आत्मनिरीक्षण से हम अपने भावों को शुद्ध रख सकते हैं। जब हम अपने ज्ञान और शक्ति का उपयोग केवल अपने लाभ के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के हित और समाज के कल्याण के लिए करते हैं, तब हमारे भावों में पवित्रता बनी रहती है। बुद्धि, विचार और कर्म जब भक्ति आधारित होते हैं तो मनुष्य सामान्य मनुष्य नहीं रहता वह दिव्यत्व को प्राप्त होता है l हमें इसी दिव्यत्व की अनुभूति करनी चाहिए l हम कौन हैं?  हम वही हैं l यह निश्चित रूप से हमें शक्ति प्रदान करेगा और इससे भक्ति जिसमें अद्भुत ऊर्जा होती है का भी प्रादुर्भाव भी होगा l


आचार्य माधवेन्द्र पुरी जी का उल्लेख क्यों हुआ, निवरता ही क्या नवरात्र है,"जहां भक्ति का आधार होता है वहां अवतारत्व फलीभूत होता है" इसे आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया,सृष्टि के नियन्त्रक के रूप में किस पर कटाक्ष हुआ,भैया विवेक भागवत जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

12.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१९०० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१९०० वां* सार -संक्षेप


हमारे अध्ययन के लिए विपुल साहित्य उपलब्ध है। यद्यपि आक्रान्ताओं और विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण हमारे साहित्य का बहुत बड़ा भाग नष्ट हो गया, तथापि आज भी हमारे पास प्रचुर मात्रा में ज्ञान का भण्डार है, जो जीवन को उचित दिशा देने और हमारी जिज्ञासाओं का समाधान करने में समर्थ है।


भगवान ने हमें शक्ति, बुद्धि, विवेक और चैतन्य प्रदान किया है। इनका सदुपयोग करते हुए यदि हम अपने समय को चिन्तन-मनन, अध्ययन, स्वाध्याय और सत्संगति में लगाएंगे , तो हमारी अन्तःशक्ति जाग्रत होगी और जीवन के प्रति हमारी दृष्टि अधिक स्पष्ट होगी। ऐसा करने पर संकट तो आएंगे, किन्तु उनकी उपस्थिति में भी व्याकुलता हमें विचलित नहीं कर पाएगी l इसके अतिरिक्त देश और समाज के प्रति भी हमारा कर्तव्य है l हम जिस समाज में जन्म लेते हैं, जिस समाज में पलते-बढ़ते हैं और जिससे हमें संस्कार, शिक्षा, सुरक्षा, सहयोग तथा जीवन जीने की दृष्टि प्राप्त होती है, उस समाज के प्रति हमारा ऋण है। हमारा व्यक्तित्व केवल हमारे अपने पुरुषार्थ का परिणाम नहीं है; उसमें परिवार, गुरुजन, पूर्वजों और सम्पूर्ण समाज का योगदान समाहित है l समाज से जो कुछ प्राप्त हुआ है, उसे सेवा, सदाचार, संस्कार और लोकमंगल के माध्यम से समाज को लौटाना ही सामाजिक ऋण से उऋण होने का मार्ग है।भारतीय जीवन-दृष्टि हमें यही सिखाती है कि व्यक्ति और समाज परस्पर पूरक हैं। व्यक्ति का उत्कर्ष समाज के उत्कर्ष से जुड़ा है और समाज की उन्नति में ही व्यक्ति के जीवन की सार्थकता निहित है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी समाज की उन्नति के लिए ही श्रीरामचरितमानस की रचना की l इस कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया, बलरामपुर अस्पताल की चर्चा क्यों हुई, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

11.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९९ वां* सार -संक्षेप

अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई॥
मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा॥3॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
  *१८९९ वां* सार -संक्षेप


भारतीय जीवन-दर्शन में ‘सत्’ का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है l उपासना का अर्थ है इसी सत् की ओर स्वयं को प्रवृत्त करने की साधना,अपने आपको जगत्-स्रष्टा, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की ओर उन्मुख करना। जब हम अपने मन, बुद्धि और अन्तःकरण को उस परम सत्ता की ओर प्रवृत्त करते हैं, तब धीरे-धीरे हमारे भीतर ईश्वर के गुणों का जागरण होने लगता है l जब हमारे भीतर ईश्वरीय गुणों का प्रकाश प्रकट होने लगता है, तब हमारा जीवन आनन्द, शान्ति, प्रेम, करुणा और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होने लगता है। इस प्रकार उपासना केवल पूजा-पद्धति नहीं, अपितु ईश्वर की ओर उन्मुख होकर अपने भीतर ईश्वरत्व को जाग्रत करने और उसकी अनुभूति प्राप्त करने की साधना है। यही अनुभूति हमें बाह्य परिस्थितियों से विचलित हुए बिना आनन्दमय जीवन जीने की प्रेरणा देती है। आज नवरात्र प्रारम्भ हो रहे हैं इसमें हम लोग जितना अधिक सरल, सहज, सात्विक बन सकें उतना बनने की चेष्टा करें जितना संगठित रहने का प्रयास कर सकें उतना करें l संगठन का सूत्र मनुष्य का स्वाभाविक गुण है उसका सात्विक स्वभाव है l वह असंगठित रह ही नहीं सकता l 

कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया, लोमश ऋषि के क्रोध से क्या घटना हुई,मां दुर्गा जो दुर्गति दुर्भाग्य  से बचाती हैं का भगवान श्रीकृष्ण से क्या संबन्ध है,उपवास का क्या महत्त्व है, भैया अजय कृष्ण जी, भैया अरविन्द जी,भैया उमेश्वर जी, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

10.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९८ वां* सार -संक्षेप


कागभुशुण्डी जी का मन निर्गुण ब्रह्म में नहीं रमता (...अज अद्वैत अगुन हृदयेसा॥

अकल अनीह अनाम अरूपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥2॥)

वे कहते हैं 

राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥

सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥5॥

यह प्रसंग है श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि जी और लोमश ऋषि के संवाद से सम्बन्धित । काकभुशुण्डि जी अपनी रामभक्ति की दृढ़ता व्यक्त करते हुए लोमश ऋषि से कहते हैं 

 भगवान राम की भक्ति रूपी जल में मेरा मन मछली के समान रम गया है।

मनुष्य इस संसार में विविध रुचियां लेकर अपना जीवनयापन करता है l मेरी रुचि भगवान राम के दर्शन में है l

 जिस प्रकार मछली जल से अलग होकर जीवित नहीं रह सकती, उसी प्रकार मेरा मन भगवान राम की भक्ति से अलग होकर नहीं रह सकता। अतः मुझे भक्ति से विमुख करने का प्रयास न करें।

हे मुनिवर! आप कृपा करके मुझे ऐसा उपदेश दीजिए, जिससे मैं अपने नेत्रों से श्रीरघुनाथ जी के दर्शन कर सकूँ। 

श्रीरामचरितमानस एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जिससे हमारे अनेक संशय दूर होते हैं l भगवान राम के सामने राजसिंहासन था, राज्य का वैभव था, सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन था; किन्तु उन्होंने पिता के वचन की मर्यादा और रघुकुल की परम्परा को सर्वोपरि माना। उन्होंने राज्य के लिए धर्म का परित्याग नहीं किया, अपितु धर्म की रक्षा के लिए राज्य का सहज भाव से त्याग कर दिया।

भगवान् श्रीराम का वनपथ पर जाना भारतीय जीवन-दर्शन की एक अद्भुत घटना है।वनवास श्रीराम के लिए ऋषियों की रक्षा, दुष्टों के दमन और धर्म की स्थापना का अभियान बन जाता है। हमारा भी ऐसा ही अभियान है l राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाना हमारा लक्ष्य है इसे हमें सदैव ध्यान में रखना है l


इसके अतिरिक्त करपात्री जी  के गुरु नारायण खत्री इंटर कालेज वाले किस प्रसंग का उल्लेख हुआ, किन प्रमुखों की बैठक की जा सकती है, श्रीकृष्ण गोपाल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

9.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९७ वां* सार -संक्षेप


हममें से कदाचित् ही कोई ऐसा हो, जिसके हृदय में भारतमाता के प्रति प्रेम का भाव न हो l इसकी जड़ें हमारी सनातनधर्मी परम्परा, हमारी संस्कृति और हमारे पारिवारिक संस्कारों में गहराई तक समाई हुई हैं l मातृभूमि के प्रति प्रेम का भाव भी हमारे संस्कारों से पुष्ट होता है।

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” 

 हमारी सनातन जीवनदृष्टि हमें व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक आत्मीयता का विस्तार करना सिखाती रही है। ऐसी थी हमारी शिक्षा l जिस शिक्षा से आत्मबल, आत्मविश्वास और कर्तव्यबोध जाग्रत हो, जो भोग की अपेक्षा त्याग तथा पलायन की अपेक्षा पुरुषार्थ सिखाए, वही शिक्षा जीवन को सार्थक बनाने वाली शिक्षा है। ऐसी शिक्षा का उद्देश्य, मनुष्य के व्यक्तित्व को इस प्रकार विकसित करना  कि वह जीवन के उतार-चढ़ावों में व्याकुल न हो, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोए और अपने कर्तव्यों से विमुख न हो, है l शिक्षक को ऐसा ही होना चाहिए जो इस प्रकार की शिक्षा दे जो केवल पाठ्यक्रम पर ही ध्यान न दे अपितु शिष्य के जीवन को उचित दिशा दे l ऐसा ही शिक्षक कह रहा है 

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।

साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥108 घ॥



( जब काकभुशुण्डि जी अपने पूर्वजन्म में शिवजी के मंदिर में शिवनाम का जप कर रहे थे, तब उनके मन में अहंकार आ गया और उन्होंने मंदिर में आए अपने गुरु का सम्मानपूर्वक अभिवादन नहीं किया। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने उन्हें शाप दे दिया।

किन्तु उनके गुरु ने अपने शिष्य के कल्याण की कामना करते हुए भगवान शिव से प्रार्थना की कि उस पर कृपा करें और शाप को शीघ्र ही उसके परम कल्याण का साधन बना दें। )


हे कृपानिधान! अब वही कीजिए, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरे के हित में रत ब्राह्मण की वाणी सुनकर पुनः आकाशवाणी हुई- 'एवमस्तु' l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, विद्यालय का कौन सा प्रसंग चर्चा में आया जानने के लिए सुनें l

8.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९६ वां* सार -संक्षेप

 बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥89 क॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९६ वां* सार -संक्षेप


“सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।

बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग॥”

हमारे जीवन में गुरु

( शान्तो दान्तः कुलीनश्च विनीतः शुद्धवेशवान्।

शुद्धाचारः सुप्रतिष्ठः शुचिर्दक्षः सुबुद्धिमान्॥

आश्रमी ध्याननिष्ठश्च मन्त्रतन्त्रविशारदः।

निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते॥ ) का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय सनातन परम्परा में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य, रामानन्दाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, ज्ञानेश्वर, नामदेव, रैदास, कबीर, दादूदयाल, गुरु नानक, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, समर्थ रामदास, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि गुरुओं की एक दीर्घ परम्परा रही है। इन गुरुओं ने समय - समय अपने ज्ञान, साधना और लोकमंगलकारी विचारों से समाज का मार्गदर्शन किया तथा भारत को भ्रम, अज्ञान और सांस्कृतिक विस्मृति से बचाते हुए सनातन जीवन-दृष्टि को सुदृढ़ बनाए रखा।

गुरु हमारे जीवन में केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि पथप्रदर्शक और पथरक्षक होता है। वह हमें पथभ्रष्ट होने से बचाता है, उचित-अनुचित का विवेक कराता है और जीवन को उचित दिशा देता है।


किन्तु आज नई पीढ़ी को प्रभावित करने वाले अनेक विचार और प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं, जिनके कारण यह धारणा बनती जा रही है कि जीवन में गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है—स्वयं ही सब कुछ जाना और समझा जा सकता है। यह स्थिति चिन्तनीय है। नई पीढ़ी के लिए भी गुरु आवश्यक है क्योंकि 

"गुरु" गौरव शक्ति प्रदाता है, 

गुरु  प्रेम भक्ति का दाता है। 

गुरु आत्मबोध का ज्ञाता है, 

गुर-शिष्य  अखण्डित नाता है ॥


हमें ही अपने गुरुत्व को निःस्वार्थ भाव से जाग्रत करना होगा और शिष्यों को भय भ्रम कुंठा से बचाना होगा l

कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया? भगवान शिव कैसे महागुरु हैं ? शिव जी की लाट क्या है? जानने के लिए सुनें l

7.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९५ वां* सार -संक्षेप

 जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥

त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥3॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९५ वां* सार -संक्षेप


एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥106 क॥


काकभुशुण्डि जी अपने पूर्वजन्म की चर्चा करते हुए गरुड़ जी से कहते हैं—हे पक्षीराज! एक बार मैं भगवान शिव के मंदिर में बैठकर निरन्तर ‘शिव’ नाम का जप कर रहा था। उसी समय मेरे गुरु वहाँ आए। परन्तु मेरे भीतर अभिमान उत्पन्न हो गया था; इसलिए गुरु को सामने आया देखकर भी मैं अपने स्थान से उठकर खड़ा नहीं हुआ और उन्हें प्रणाम भी नहीं किया।

‘गुरु’ को केवल सामान्य शिक्षक मानना पर्याप्त नहीं है ।  गुरु ज्ञानदाता, संस्कारदाता और जीवन का मार्गदर्शक है। इसी कारण गुरु के आने पर अभिमानवश उठकर प्रणाम न करना गंभीर दोष के रूप में सामने आता है। सनातनधर्मी सिद्धान्त यह है कि यदि हम किसी सिद्धमूर्ति के सामने पूजा कर रहे हैं तो किसी के भी वहां आने पर हम उसे प्रणाम नहीं करेंगे किन्तु यदि गुरु आये हैं तो पूजन में भंग डालकर उन्हें प्रणाम करेंगे क्योंकि गुरु प्रथम है l


गुरु के हृदय में करुणा, वात्सल्य और शिष्य के प्रति आत्मीयता होती है। वह शिष्य की जिज्ञासा को समझता है, उसकी भूलों का परिष्कार करता है और उसे जीवन के सत्य का बोध कराता है।


किन्तु गुरु के प्रति अनादर देखकर भगवान शिव के मन में  क्रोध उत्पन्न हुआ। उन्होंने काकभुशुण्डि जी को शाप दिया कि उनके अहंकार का परिणाम उन्हें भोगना पड़ेगा।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, विद्यालय की चर्चा क्यों हुई, स्तुत के क्या अर्थ हैं जानने के लिए सुनें l

6.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९४ वां* सार -संक्षेप

 एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥106 क॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९४ वां* सार -संक्षेप

श्रीरामचरितमानस एक अद्भुत काव्यग्रंथ भी है। इसकी महिमा जितनी कही जाए, उतनी ही कम है। इसे पढ़कर और सुनाकर असंख्य लोगों ने यश प्राप्त किया है आजीविका अर्जित की है; आज भी अनेक लोग इसके माध्यम से यश और धन दोनों प्राप्त कर रहे हैं श्रीरामचरितमानस एक ऐसा जीवनोपयोगी ग्रंथ है, जिससे हमें लोकव्यवहार की शिक्षा, कर्तव्य-बोध, मर्यादा, नीति, विवेक और जीवन जीने की कला प्राप्त होती है। इसके प्रत्येक प्रसंग में मनुष्य के जीवन को दिशा देने वाला कोई न कोई संदेश निहित है,इसका व्यावहारिक परामर्श अद्वितीय है l

श्रीरामचरितमानस का श्रवण, मनन और अनुशीलन अमंगल का नाश करने वाला तथा मंगल का संवर्धन करने वाला है। इसकी कथा और श्रीराम के चरित्र का चिंतन करते ही मन को तत्काल आनन्द प्राप्त होता है। यह आनन्द केवल क्षणिक मनोरंजन का नहीं, बल्कि अन्तःकरण को शान्ति, आश्वस्ति और प्रसन्नता प्रदान करने वाला है।


कागभुशुण्डी जी कहते हैं

हे पक्षीराज! सुनिए, अब मैं अपने प्रथम जन्म के चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभु के चरणों में प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं॥


पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।

नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥96 ख॥

किन्तु यह भी एक सिद्धान्त है कि अनेक विकारों के मध्य  सद्विचारों का भी अस्तित्व रहता है l

तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में शैव और वैष्णव परम्पराओं का अद्भुत समन्वय किया। उन्होंने भगवान शिव को भगवान राम का अनन्य भक्त और भगवान राम को भगवान शिव का परम आराध्य दिखाकर दोनों सम्प्रदायों के बीच सेतु बनाया।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मम्मट का नाम क्यों लिया, अहंकारी भक्त कौन है जानने के लिए सुनें l

5.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९३ वां* सार -संक्षेप


संसार के प्रपंचों के कारण हम व्याकुल न रहें, इसका एक आधार है भक्ति। भक्ति अर्थात् विश्वास और विश्वास का गहनतम रूप है आत्मविश्वास।

जब हम अपने भीतर स्थित परमात्म-तत्त्व पर विश्वास करते हैं  उसकी शक्ति की अनुभूति करते हैं , तब हम बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होते हैं l प्रातःकाल इस प्रकार के विचारों से हमारे भीतर प्राणिक ऊर्जा भर जाती है l

संसार की गति और मति यदि समाज के हित में नहीं है, तो उसके प्रति उदासीन न रहें; उसके कारणों को समझकर, विवेकपूर्वक उसके निरसन का उपाय करें। हमारा चिन्तन केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित न हो, बल्कि उसमें समाज और राष्ट्र के हित का भाव भी समाहित हो।


भारत के शौर्य जगो निष्ठा जागो तप त्याग जगो

संपूर्ण समर्पण वाले हे अनुराग जगो



ओ जगो वेन कुलनाशी ऋषि के आक्रोश

वनवासी रघुकुल राम भरत के त्याग जगो....

भगवान राम का संसारी जीवन एक आदर्श प्रस्तुत करता है 

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥



रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।

संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥92 क॥


श्रीराम के गुण अनन्त हैं; संतों से जितना सुना और समझा, उतना ही विनम्रतापूर्वक दूसरों तक पहुँचाना ही साधक का सौभाग्य है l 

इसके अतिरिक्त कथा में आचार्य जी ने और क्या बताया,आचार्य जी ने डायरी लेखन प्रतिदिन करने पर क्यों बल दिया,अहंकार और पतन में क्या संबन्ध है, सिंगापुर में एक पहिए के वाहन का प्रसंग किस कारण उठा, संतुलन किसमें आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

4.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९२ वां* सार -संक्षेप

 मानव-जीवन का कर्म धर्म की शोभा है, 

कर्मानुराग ही उसकी पूर्ण प्रतिष्ठा है। 

ईश्वर ने कर्म हेतु ही मानव को सिरजा, 

मानव की कर्मोहेतु सहज ही निष्ठा  है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९२ वां* सार -संक्षेप



श्री रामचरित मानस एक अद्भुत ग्रंथ है यह पापों का नाश करने वाला, सदा कल्याणकारी,माया,भ्रम,मोह,भय  का नाश करने वाला है l जो मनुष्य श्रीराम के चरित्र, आदर्शों और उपदेशों में अपने मन को निमग्न करते हैं वे सांसारिक प्रपंचों में उलझने से बच जाते हैं l यह ग्रंथ ज्ञान वैराग्य और भक्ति के भाव को जाग्रत कर देता है l


निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥

राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई ll


काकभुशुण्डि जी केवल शास्त्र का उपदेश नहीं दे रहे हैं, बल्कि भक्ति में पूर्णतः रमकर अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर गरुड़ जी से कह रहे हैं।

—हे पक्षीराज गरुड़! अब मैं आपको अपने जीवन का अनुभूत सत्य बताता हूँ। संसार में मनुष्य अनेक प्रकार के उपाय करता है, किन्तु हरि-भजन के बिना अन्तःकरण के क्लेश,भय, मोह और अशान्ति का स्थायी निवारण नहीं हो सकता। भगवान श्रीराम की भक्ति ही मन को वास्तविक शान्ति प्रदान करती है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कोरोना काल का उल्लेख क्यों किया,

दक्षिणेश्वर मूर्ति की चर्चा क्यों हुई,हम रामत्व की अनुभूति कैसे कर सकते हैं और इससे किस प्रकार लाभान्वित हो सकते हैं जानने के लिए सुनें l

3.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९१ वां* सार -संक्षेप

 भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥

भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा॥3॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९१ वां* सार -संक्षेप


सांसारिक प्रपंचों में उलझे रहने पर भी जब कभी हमें स्वयं को संस्कारित करने का अवसर मिले, हमें उस अवसर को कदापि नहीं छोड़ना चाहिए।  यज्ञमयी भारतीय जीवन-दर्शन में आत्मपरिष्कार और संस्कारपूर्ण जीवन को विशेष महत्त्व दिया गया है। ये असामान्य सदाचार वेलाएं इसी भारतीय जीवन-दृष्टि के अनुरूप हमें भीतर से परिष्कृत करने, हमारे आचरण को श्रेष्ठ बनाने और जीवन को सार्थक दिशा देने का एक अमूल्य अवसर हैं। तो आइये इस अवसर का लाभ उठाएं l


हनुमान चालीसा भक्ति, शक्ति, सेवा, समर्पण और विवेक का अत्यन्त भावपूर्ण काव्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसमें भगवान श्रीहनुमान के स्वरूप, गुण, सामर्थ्य और प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति का अत्यन्त सुंदर चित्रण किया है। इसकी प्रत्येक चौपाई साधक को अपने जीवन में शौर्य, पराक्रम , संयम, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता अपनाने की प्रेरणा देती है।हनुमान चालीसा में अत्यन्त गहन और भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसे अवधी भाषा में रचकर गूढ़ आध्यात्मिक भावों को अत्यन्त सरल और सहज बना दिया है। फ्लाईदुबई का विमान उड़ाते समय कैप्टन स्मित मच्छार हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे।


जै जै जै हनुमान गोसाईं ।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥


जो सत बार पाठ कर कोई ।

छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने स्वास्थ्य शिविर का उल्लेख क्यों किया,बाबा गोरखनाथ का नाम क्यों आया, रामकथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

2.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९० वां* सार -संक्षेप


मनुष्य को अपने वास्तविक मनुष्यत्व की अनुभूति अवश्य होनी चाहिए और इसके लिए हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो केवल जीविका का सामर्थ्य प्रदान न करे, अपितु मनुष्य को संस्कारित करे उसे शक्तिसंपन्न बनाए उसे मनुष्यत्व की अनुभूति भी कराए। मनुष्यत्व का अर्थ केवल शरीर धारण करना नहीं, अपितु अपने भीतर निहित दिव्यता, कर्तव्यबोध, संवेदनशीलता,प्रेम,आत्मीयता तथा लोकमंगल की भावना को जाग्रत करना है।जब मनुष्य अपने स्वरूप को पहचानता है, तब वह आलस्य, प्रमाद और निराशा से ऊपर उठकर जीवन के उच्च उद्देश्यों की ओर अग्रसर होता है।अतः हमें अपने शैथिल्य, अकर्मण्यता और जड़ता का त्याग करना चाहिए। जीवन का सौन्दर्य कर्म में है, पुरुषार्थ में है और सतत प्रयत्न में है l समाज तथा राष्ट्र की उन्नति में योगदान देने हेतु  जागतिक व्यथा दूर करने हेतु भारत में जन्मे हम राष्ट्रभक्त कर्मरत हों l


भारत हिंदूराष्ट्र सनातन तत्व शक्ति का संगम है, 

इसका जन जन ज्ञान समन्वित शक्तिभक्ति भी अनुपम है। 

भारत है उत्साह उमंगों वाली अनुपम दिव्य कथा, 

भारत है अध्यात्म समन्वित नाशक है जागतिक व्यथा ॥

जागतिक व्यथा को दूर करने का भारतीय जीवन-दृष्टि के व्याख्याता साहित्यावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी प्रयास किया l


राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥

जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥1॥


गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं—हे गरुड़ जी ! मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह मेरी अपनी बुद्धि या विद्वत्ता का परिणाम नहीं है; यह तो श्रीराम की कृपा है। मैं अल्पबुद्धि आपसे निवेदन करता हूँ कि ध्यानपूर्वक सुनिए।

जब-जब भगवान श्रीराम मनुष्य का शरीर धारण करके अवतरित होते हैं, तब वे अपने भक्तों के कल्याण, प्रेम और उद्धार के लिए अनेक प्रकार की दिव्य लीलाएँ करते हैं।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कथा में और क्या बताया, रामलाल का उल्लेख क्यों हुआ, किस शूटिंग में कौवा उपस्थित था जानने के लिए सुनें l

1.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८९ वां* सार -संक्षेप


श्रीरामचरितमानस में

ज्ञान-गरिमा से मण्डित व्यक्तित्व गोस्वामी तुलसीदास जी ने विविध प्रकार के प्रसंगों के माध्यम से हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को प्रेरणा दी है कि हम अपने भय,भ्रम, लोभ, लालच का त्याग करें, अपनी अन्तर्निहित क्षमताओं को पहचानें, अंधकार को भगाने के उपक्रम में रत हों और अपने जीवन के उद्देश्य को समझें।

मानस हमें यह बोध कराता है कि हम परमात्मा से पृथक् नहीं हैं; परमात्मा का अंश हमारे भीतर विद्यमान है। अतः अपने भीतर स्थित उस दिव्य शक्ति को जाग्रत करके हमें धर्म, सत्य और लोकमंगल के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

श्रीराम का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि जब-जब अधर्म और आसुरी प्रवृत्तियाँ बढ़ें, तब सज्जन शक्ति को  जाग्रत होकर उनका प्रतिकार करना चाहिए। हमारा उद्देश्य केवल अपने लिए जीवित रहना नहीं, अपितु धर्म की रक्षा, दुष्ट प्रवृत्तियों का विनाश और समस्त समाज के कल्याण के लिए अपने सामर्थ्य का उपयोग करना है।

आजकल हम लोग रामकथा में ही प्रविष्ट हैं 


निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोई।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होई॥ 73 ख॥



गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि निर्गुण, निराकार ब्रह्म का बोध अपेक्षाकृत सहज है, क्योंकि उसमें किसी विशेष रूप, गुण अथवा लीला का विचार नहीं करना पड़ता। किंतु सगुण-साकार भगवान के वास्तविक स्वरूप और उनकी दिव्य लीलाओं का रहस्य अत्यन्त गूढ़ है।


भगवान के चरित्र कभी अत्यन्त सरल और सहज दिखाई देते हैं तो कभी इतने अगम और रहस्यमय कि बड़े-बड़े मुनियों के मन में भी उनके स्वरूप और लीलाओं को लेकर विस्मय उत्पन्न हो जाता है l



इसके अतिरिक्त बालभारती, किशोरभारती, तरुणभारती का उल्लेख क्यों हुआ, नये विद्यालय की योजना में आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया, भैया शुभेन्दु जी का नाम क्यों आया, बुद्धि, प्रमा, प्रतिभा, मेधा, विवेक में क्या अन्तर है,आचार्य जी ने अपनी रचित कौन सी कविताएं सुनाईं जानने के लिए सुनें