6.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७२ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५४

जब हम आत्मचिन्तन करते हैं तो आनन्द में रहते हैं और जब लोकचिन्तन करते हैं तो व्याकुल रहते हैं किन्तु लोक को जब आत्म के साथ संयुत करने का प्रयास करते हैं तो उत्साह प्राप्त होता है l



समस्याओं का अस्तित्व जीवन का स्वाभाविक अंग है। यदि समस्याएँ ही न हों, तो समाधान की खोज, नवोन्मेष की प्रेरणा और पुरुषार्थ का अवसर भी नहीं मिलेगा। अनेक बार वही कठिनाइयाँ हमें विचार करने, सीखने और अपनी क्षमताओं का विकास करने के लिए प्रेरित करती हैं।

संसार के साथ सामंजस्य केवल अनुकूल परिस्थितियों से नहीं बनता, बल्कि प्रतिकूलताओं का धैर्यपूर्वक सामना करने और उनके समाधान खोजने से बनता है। यदि हम  समस्याओं से भागते हैं तो हम विकास के अवसरों से भी दूर हो जाते हैं परन्तु  उन्हें समझकर समाधान की दिशा में प्रयत्न करते हैं तो जीवन में स्थिरता और सफलता प्राप्त करते हैं l

समस्याएँ पुरुषार्थ को जाग्रत करती हैं और शरीर उस पुरुषार्थ के प्रकट होने का माध्यम बनता है।शरीर धारण करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। यह शरीर एक ओर रोगों का घर कहा गया है  परन्तु दूसरी ओर यही शरीर धर्म, साधना, सेवा, ज्ञानार्जन और लोकमंगल का साधन भी है। अतः शरीर के प्रति न तो अत्यधिक आसक्ति रखनी चाहिए और न ही उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। उसकी आवश्यक देखभाल, स्वच्छता, स्वास्थ्य-संरक्षण और पोषण आवश्यक है, क्योंकि स्वस्थ शरीर से ही उच्च आदर्शों की पूर्ति सम्भव होती है। किन्तु साथ ही यह स्मरण भी रहना चाहिए कि शरीर साधन है, साध्य नहीं। इसका उद्देश्य केवल भोग नहीं, अपितु कर्तव्य, सेवा, साधना और आत्मविकास है।

इस प्रकार शरीर के प्रति समभाव रखना चाहिए— न मोह, न तिरस्कार; न अहंकार, न उपेक्षा। उसकी रक्षा करें, परन्तु उसे ही अपना सम्पूर्ण स्वरूप न मानें।

यदि मनुष्य अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक और लोककल्याण की भावना से पालन करता है, तो वही उसकी ईश्वर-पूजा बन जाती है।

जो शिक्षक निष्ठापूर्वक शिक्षा देता है, जो कृषक परिश्रमपूर्वक अन्न उत्पन्न करता है, जो चिकित्सक सेवा-भाव से रोगियों का उपचार करता है, जो सैनिक राष्ट्ररक्षा करता है, जो साधक स्वाध्याय,साधना, लेखन -योग करता है—वे सभी अपने-अपने कर्म द्वारा परमात्मा की आराधना कर रहे होते हैं।

तुलसीदासजी संकेत करते हैं कि जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का आश्रय नहीं छोड़ता, उसकी रक्षा स्वयं भगवान् करते हैं। रावण के राज्य से निष्कासित विभीषण को श्रीराम ने न केवल शरण दी, बल्कि आगे चलकर लंका का अखण्ड राज्य भी प्रदान किया 


रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥

सुन्दर कांड में आचार्य जी ने आज और क्या बताया,साध्वी ऋतंभरा (दीदी माँ) के गुरु युगपुरुष महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद गिरिजी महाराज का उल्लेख क्यों हुआ, जाजमऊ की चर्चा क्यों हुई, भैया अरविन्द जी की किस योजना का संकेत हुआ, भैया संतोष मिश्र जी द्वारा दी गयी किस पुस्तक का उल्लेख हुआ जानने के लिए सुनें l