प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८१३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९५
इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कर्म के अनुसार योग, भोग और रोग का अनुभव करता है। संसार अपनी गति से चल रहा है और हम भी जीवन-पथ पर निरन्तर अग्रसर हैं। इस यात्रा में यदि हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को समान भावों वाले सहयात्री मिल जाएँ, तो काँटों से भरा मार्ग भी आनंदमय प्रतीत होता है। परन्तु यदि साथी उचित न हों , तो सुख-सुविधाओं से युक्त यात्रा भी मन को संतोष नहीं दे पाती।
इसीलिए हमारा प्रयास एक ऐसे सुदृढ़, संस्कारित,राष्ट्र और समाज के लिए सदैव समर्पित संगठन का निर्माण करना होना चाहिए, जो हमारे जैसे प्रत्येक व्यक्ति को उचित दिशा, शक्ति और प्रेरणा प्रदान करे।
*संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो।*
*भला हो जिसमें देश का, वह काम सब किए चलो।*
हम अणु आत्मा हैं और परमात्मा विभु आत्मा है। विस्मृति के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाते। वस्तुतः हमारा आत्मस्वरूप परमात्मा से अभिन्न है। उपनिषद् का "तज्जलान्" महावाक्य इसी सत्य का संकेत करता है कि यह सम्पूर्ण जगत उसी ब्रह्म से उत्पन्न, उसी में स्थित और अन्ततः उसी में लीन होता है। अतः आत्मस्वरूप का बोध होने पर ज्ञात होता है कि *अहं ब्रह्मास्मि* मेरा वास्तविक स्वरूप वही ब्रह्म है।
अवतरण और उद्धरण भगवान की अद्भुत लीला हैं। उनकी लीला कब, किस पर और किस प्रकार प्रकट हो जाए, यह कोई नहीं कह सकता। महर्षि वाल्मीकि ने ही आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास के रूप में अवतार लिया। इसी प्रकार यह भी सत्य है कि श्रीहनुमानजी ने शिलाओं पर रामकथा अंकित की थी। श्रद्धा की दृष्टि से ये प्रसंग हम भक्तों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। मनुष्य की दृष्टि उसके अन्तःकरण पर निर्भर करती है। यदि हमारे भीतर मलिनता होगी, तो हम हर तथ्य का अनर्थ निकालेंगे; किन्तु यदि मन निर्मल, श्रद्धामय और विवेकयुक्त होगा, तो वही प्रसंग हमें सत्य, प्रेरणा और ईश्वर की लीला के रूप में दिखाई देंगे। इसी कारण हमें मनुष्यत्व की आराधना करनी चाहिए और अपनी सोच को सकारात्मक रखना चाहिए l
यही सकारात्मक सोच हनुमान जी ने रखी
जब मेघनाद के शक्ति-बाण से लक्ष्मणजी मूर्छित हो गए, तब वैद्य सुषेण ने कहा कि हिमालय के द्रोणगिरि से कुछ विशिष्ट औषधियाँ लानी होंगी, जिनमें संजीविनी भी थी।
हनुमानजी तत्काल आकाशमार्ग से हिमालय पहुँचे। रात्रि होने के कारण वे निश्चित रूप से संजीविनी की पहचान नहीं कर सके। इसलिए उन्होंने पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया l मार्ग में भरत जी अयोध्या की रक्षा में सन्नद्ध हैं वो पूजा ध्यान में मग्न नहीं हैं
देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥58॥
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,
चित्रकूट के राम -दर्शन की चर्चा क्यों की, कायमगंज के भैया जीतेन्द्र जी और उनके ममेरे भाई की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें l