प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८१४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९६
आज भी रावण विद्यमान है
उसे समाप्त करने के लिए हम अपनी कर्मठता का दीपक जलाएं समाज और देश के हित के लिए जो कुछ भी कर सकें अवश्य करें l
दीर्घकाल से यह सदाचार-संप्रेषण निरन्तर चल रहा है। यह पूज्य आचार्य जी और हम सभी के मध्य एक सुदृढ़ सेतु है। इसी के माध्यम से हमारा पारस्परिक सम्पर्क तथा आत्मीय सम्बन्ध सतत बने हुए हैं। हम सौभाग्यशाली हैं कि आचार्य जी का मार्गदर्शन, प्रेरणा और स्नेह निरन्तर हम तक पहुँच रहा है तथा हम सब भी अपने विचारों और जिज्ञासाओं को उनके समक्ष निवेदित करते रहते हैं। इस प्रकार यह सदाचार-संप्रेषण हम सबको एक सूत्र में आबद्ध कर संगठन, संस्कार और साधना की भावना को निरन्तर पुष्ट कर रहा है।
इन दिनों हम सब रामकथा के अमृतमय प्रवाह में अवगाहन कर रहे हैं। यदि रामकथा का एक अंश भी हमारे जीवन में उतर आए, यदि रामत्व की एक किरण भी हमारे आचरण में प्रकाशित हो जाए, तो यही कथा-श्रवण सार्थक हो जाएगा l
मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥ 30(क)॥
गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु श्री नरहर्यानन्द जी रामकथा के माध्यम से जो समझाना चाहते थे, तुलसीदास जी उसको पूर्णतः नहीं समझ पाए।
हमारी स्थिति भी ऐसी ही है। परमात्मा जो कहता है और जो हमसे करवाना चाहता है यदि हम उसकी इच्छा को समझ लें और उसके अनुसार चलें तो हम भी वही हो जाएं l
किन्तु तुलसीदास जी को जब रामकथा का तत्त्व हृदयंगम हुआ, तब वे स्वयं राममय हो गए और उनकी वाणी से अद्भुत ग्रंथ 'श्रीरामचरितमानस' का प्राकट्य हुआ।
जिसके मर्म को प्रसारित करते करते उन्होंने संपूर्ण सनातनधर्मी समाज को जाग्रत करने का प्रयास किया l
इस समय हम लोग अयोध्या में प्रविष्ट हैं
हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने गये थे । लौटते समय अयोध्या के ऊपर से गुजरते हुए भरत जी उन्हें कोई राक्षस समझकर बाण चला देते हैं। बाण के प्रभाव से हनुमान जी नीचे गिर जाते हैं और पूरी घटना (लक्ष्मण जी को शक्ति लगने और बूटी लाने की) बताते हैं l
भरत जी को ज्ञात हुआ कि ये तो श्रीराम के परम भक्त हनुमान हैं। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक उनसे क्षमा माँगी, उनका सम्मान किया l इसके पश्चात्
तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥
चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥3॥
भरत जी ने प्रेमपूर्वक कहा—"वत्स! यदि तुम ऐसे जाओगे तो बहुत देर हो जाएगी। प्रभात हो जाने पर तुम्हारा कार्य बिगड़ जाएगा। अतः तुम मेरे बाण पर इस पर्वत सहित बैठ जाओ। मैं तुम्हें उस स्थान पर पहुँचा देता हूँ जहाँ कृपा के धाम श्रीराम विराजमान हैं।"
समाज और राष्ट्र के लिए पूर्णरूपेण समर्पित मां कैकेयी के बारे में आचार्य जी ने क्या बताया, भैया जीतेन्द्र जी का उल्लेख क्यों हुआ, अयोध्या दर्शन वास्तव में क्या है जानने के लिए सुनें