अपने कुलगुरु व्यास, पतंजलि,विष्णुगुप्त इत्यादि सभी को;
है प्रणाम मेरा ऋषि मुनि हर वीर सुधी को।
धर्म सनातन राष्ट्र पुरातन जगद्वंद्य भारतमाता को,
परमपिता परमात्म शक्ति है मान्य जिसे उस हर भ्राता को ---------।
आज गुरूपूर्णिमा की मंगल वेला में साष्टांग प्रणाम करता हूँ !!!
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा )विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८२५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०७
यह अविश्वास का अंधकार है आत्मदीप हो जाओ,
युगचारण जागो कसो कमर फिर से भैरवी सुनाओ l
अपने संगठन के प्रति आदरभाव रखें, अधिवेशन को सफल बनाने के लिए तैयारियां प्रारम्भ कर दें l
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥130 ख॥
जिस प्रकार एक कामी मनुष्य का मन निरंतर स्त्री में लगा रहता है और जिस प्रकार एक लोभी का चित्त हर समय धन में रमा रहता है, उसी प्रकार हे रघुनाथ! आप मुझे प्रत्येक क्षण, बिना किसी व्यवधान के, अत्यंत प्रिय लगें।
यदि हम इसी भाव में प्रविष्ट होकर श्रीरामचरितमानस का पाठ करें, तो उसका प्रभाव केवल वाणी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ेगा। हमारे भीतर बुद्धि की निर्मलता, भक्ति की गहराई, संयम की दृढ़ता, विचारों की प्रखरता और स्वाध्याय की रुचि विकसित होगी। साथ ही, सनातन धर्म की रक्षा के लिए, समाज और राष्ट्र की उन्नति हेतु आवश्यक शौर्य, पराक्रम, आत्मविश्वास और कर्तव्यनिष्ठा भी जाग्रत होगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर के निर्वीर्य भाव का शमन करें। देवत्व को लांघकर ईश्वरत्व तक पहुंचने की कल्पना करें l धर्म,समाज और राष्ट्र को शक्तिसम्पन्न बनाने का प्रथम चरण स्वयं को शक्तिसम्पन्न बनाना है। जब व्यक्ति विचार, चरित्र और शौर्य से समृद्ध होता है, तभी वह परिवार, समाज और राष्ट्र के उत्थान में सार्थक योगदान दे सकता है। यही श्रीरामचरितमानस के सतत अध्ययन और मनन का वास्तविक फल है।
आजकल हम लोग मानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं जहां विभीषण समझ चुके हैं कि विजय केवल साधनों से नहीं, साधना से प्राप्त होती है। बाहरी रथ, शस्त्र और सेना सीमित सामर्थ्य देते हैं, किन्तु सत्य, शील, धैर्य, विवेक, संयम, परोपकार, भक्ति, ईश्वर-विश्वास और आत्मशक्ति से निर्मित धर्मरथ अजेय होता है।
सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया मनुस्मृति, कालिका पुराण, कूर्म पुराण (अध्याय ११), युक्ति कल्पतरु, चाणक्य,स्मृति कौस्तुभ, पुरुषार्थ चिन्तामणि आदि का उल्लेख क्यों हुआ ,व्यास पूजा क्या है जानने के लिए सुनें l