प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८२६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०८
श्रीरामचरितमानस, जो अत्यन्त सरल भाषा में है,का अध्ययन, चिन्तन, मनन, पठन पाठन अवश्य करें l आत्मस्थ होने का कुछ समय भी निकालें l ध्यान, धारणा, आसन, व्यायाम,प्राणायाम, सात्विक भोजन की महत्ता को समझें l
सनातन धर्म आज भी विविध रूपों में फल-फूल रहा है और सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है। हमारा कर्तव्य है कि हम इसके सिद्धान्तों का निष्ठापूर्वक पालन करें। साथ ही शौर्य, पराक्रम, आत्मविश्वास और पुरुषार्थ की उपासना करें। कुंठा, हताशा और निराशा को अपने जीवन में स्थान न दें।
जब अकबर के कारण देश विषम परिस्थितियों से घिरा हुआ था तब गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस नामक अद्भुत महाग्रन्थ की रचना करके समाज को आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक शक्ति का अद्वितीय आधार प्रदान किया। मानस ने जन-जन में धर्म, शौर्य,पराक्रम , मर्यादा, कर्तव्य और आत्मविश्वास का संचार किया। यही कारण है कि यह महाग्रन्थ केवल अपने समय का ही नहीं, बल्कि आज भी हमारे जीवन का अमूल्य मार्गदर्शक बना हुआ है और भविष्य में भी मानवता का पथ आलोकित करता रहेगा।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥1॥
गुरु-कृपा से विवेक प्राप्त होता है, विवेक से प्रभु श्रीराम का चरित्र समझ में आता है और प्रभु श्रीराम का चरित्र मनुष्य को संसार की सांसारिकता के सारे कालुष्यों से मुक्त कर देता है। वनपथ पर चलने के पश्चात् प्रभु श्रीराम का जो रामत्व प्रकट हुआ है वह अवर्णनीय है l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने लंका कांड के वर्णन में आज क्या बताया,संसद का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें