प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 31 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८२७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०९
तूफान फिर से कुनमुनाने सा लगा है,
सियारों की जमातें जुट रही हैं,
सजग हो फिर वही तेवर दिखाओ,
स्वदेशी क्यारियाँ भी स्यात कुछ कुछ लुट रही हैं।
ऐसा प्रतीत हो रहा है कि संकट का वात्याचक्र पुनः सिर उठाने लगा है। सनातनधर्म विरोधी और राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ एकत्र होकर अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लग गई हैं। इसलिए अब पुनः सजग होने, संगठित होने और दृढ़ता का परिचय देने की आवश्यकता है। यदि हम सतर्क नहीं हुए, तो हमारी अपनी संस्कृति, परम्पराएँ क्षरित होंगी l
आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं जहां लक्ष्मण जी और रावण पहली बार आमने सामने होंगे
निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ॥ ८२॥
जब लक्ष्मण जी ने देखा कि अपनी वानर सेना शत्रु के प्रबल आक्रमण से अत्यन्त व्याकुल और विचलित हो गई है, तब उन्होंने कमर में तरकस कस लिया, हाथ में धनुष धारण किया और श्रीराम जी के चरणों में मस्तक झुकाकर वे क्रोधपूर्वक युद्ध के लिए चल पड़े।
लक्ष्मण जी ने रावण के पास जाकर कहा - अरे दुष्ट! वानर भालूओं को क्या मार रहा है? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ।
युद्ध चल रहा है
रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा। फिर मूर्च्छा छूटने पर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलाई जो ब्रह्मा ने उसे दी थी। वह ब्रह्मा की दी हुई प्रचंड शक्ति लक्ष्मण जी की ठीक छाती में लगी। वीर लक्ष्मण जी व्याकुल होकर गिर पड़े।
यह देखकर पवनपुत्र हनुमान जी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े। हनुमान जी के आते ही रावण ने उन पर अत्यंत भयंकर घूँसे का प्रहार किया॥ हनुमान जी घुटने टेककर रह गए, पृथ्वी पर गिरे नहीं। और फिर क्रोध से भरे हुए सँभलकर उठे। हनुमान जी ने रावण को एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्र की मार से पर्वत गिरा हो।
हनुमान जी का यह संदेश अद्भुत है हमें भ्रमित भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हनुमान जी हम रामोपासकों की रक्षा के लिए अब भी हमारे साथ हैं l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने गुरुशिष्य के आदर्श संबन्ध को किस प्रकार व्याख्यायित किया, चोरबत्ती क्या है, भैया विनय अजमानी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l