पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं।
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः ll
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८२८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१०
भारत की भास्वरता धूमिल पश्चिम का अँधियार लदा,
कुछ जुगुनू अब भी कोशिश रत जाने क्या है लिखा बदा ।
समय की पुकार है कि सनातनधर्मी राष्ट्रभक्त समाज के जागरण, चरित्र-निर्माण और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण में अपना योगदान देना ही हमारा कर्तव्य है इसी प्रकार का कार्य तुलसीदास जी ने भी किया था l
साहित्यावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ऐसे विषम और संक्रमणकालीन समय में अवतरित हुए, जब भारतीय समाज अनेक प्रकार के संकटों से घिरा हुआ था। उन्होंने यह दृढ़ संकल्प किया कि सनातन धर्म के शाश्वत आदर्शों के आधार पर भारतीय समाज को पुनः जाग्रत , संगठित और आत्मविश्वास से परिपूर्ण करना है। इसी उद्देश्य से उन्होंने श्रीरामचरितमानस, जिसके श्रद्धापूर्वक अध्ययन, श्रवण और मनन करने से मनुष्य के अंतःकरण की मलिनता दूर होकर उसमें ज्ञान, भक्ति, प्रेम और कल्याण का उदय होता है,की रचना की l और इस प्रकार भगवान् श्रीराम के आदर्श चरित्र के माध्यम से धर्म, नीति, भक्ति,शौर्य, पराक्रम,मर्यादा, लोकमंगल का संदेश जन-जन तक पहुँचा l
आजकल हम लोग इसी मानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं
लक्ष्मण जी के रावण से युद्ध के पश्चात्...
हनुमान जी ने रावण को एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्र की मार से पर्वत गिरा हो।मूर्च्छा भंग होने पर फिर वह जागा और हनुमान के बड़े भारी बल को सराहने लगा। इस बीच लक्ष्मण जी को उठाकर हनुमान जी रघुनाथ जी के पास ले आए। यह देखकर रावण को आश्चर्य हुआ। उसे शक्ति का आधार तो मिला है किन्तु भक्ति का विश्वास प्राप्त नहीं हुआ है l
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, जिम आदि से क्यों सचेत रहें, आत्म -श्रवण क्या है, शुक्राचार्य का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l