प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष द्वादशी / त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८३७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१९
अपने संगठन युगभारती में बन्धुता, प्रेम और आत्मीयता का विस्तार करें l माता, पिता, दादा, दादी की उपेक्षा न करें l
रहे समक्ष हिम-शिखर,
तुम्हारा प्रण उठे निखर।
भले ही जाए जन बिखर,
रुको नहीं, झुको नहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो।
हमें मार्गदर्शन देने वाली, हमें मनुष्यत्व की अनुभूति कराने वाली तथा बिना फल की इच्छा किए कर्म करने की प्रेरणा देने वाली भारतवर्ष की आर्ष परम्परा अद्भुत है। यह परम्परा केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग ही नहीं दिखाती, बल्कि हमारे जीवन में बन्धुता, प्रेम, आत्मीयता, आत्मविश्वास, देशभक्ति, देशसेवा और समाजसेवा जैसे श्रेष्ठ भावों का भी जागरण करती है। विकृत भावों से बचाती है l विकारों विचारों के संघर्ष में विकारों के निरसन और विचारों के संवर्धन का उत्साह प्रदान करती है l
यह परम्परा हमें यह बोध कराती है कि हम केवल श्रद्धा और उपासना तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, धैर्य, शौर्य, पराक्रम और कर्तव्यबोध से सम्पन्न होकर सत्य, धर्म और राष्ट्र की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व समर्पित करने के लिए प्रेरित हों l
भारत की इस महान् आर्ष परम्परा ने मानव-जीवन के प्रत्येक पक्ष को स्पर्श करने वाला विपुल साहित्य उपलब्ध कराया है। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, दर्शन-ग्रन्थ तथा संत-साहित्य—इन सबमें जीवन को सही दिशा देने वाले, आदर्श व्यवहार आदर्श परिवार का बोध कराने वाले असंख्य सूत्र निहित हैं। मार्गदर्शक त्यागी तपस्वी विद्वान् राष्ट्ररत्न गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस आदर्श व्यवहार और आदर्श परिवार का एक अद्भुत उदाहरण है
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात॥राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥1ख॥
भरत जी कुश की आसनी पर बैठे हुए हैं। उनके सिर पर जटाओं का मुकुट है और राम-विरह में उनका शरीर अत्यन्त कृश हो गया है। वे निरन्तर “राम! राम! रघुपति!” का जप कर रहे हैं और उनके कमल-सदृश नेत्रों से आँसू बह रहे हैं।
श्रीराम शत्रु को युद्ध में पराजित करके विजय और यश प्राप्त कर रहे हैं, जिसका देवता भी गान कर रहे हैं। वे सीता जी और अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी सहित अयोध्या आ रहे हैं।
यह समाचार सुनते ही भरत जी के सारे दुःख दूर हो गए। उनकी स्थिति ऐसी हो गई जैसे कोई अत्यन्त प्यासा व्यक्ति अचानक अमृत पा जाए।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,आचार्य जी ने भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी से क्या पूछने के लिए कहा, Gen Z, जिसमें १९९०के दशक के उत्तरार्ध से २०१० के दशक के आरम्भ तक जन्मे लोगों को रखा जाता है,का उल्लेख क्यों हुआ, भैया प्रभाकर जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l