प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (सावन शिवरात्रि ) विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८३८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२०
हम स्वयं को जानें , स्वयं को पहचानें और निरंतर अपने अंतर्मन का निरीक्षण करते रहें । स्वयं के गुणों को विकसित करने और दोषों को दूर करने का प्रयास करते रहें l
एकांत में बैठकर जब हम अपने जीवन और अपने कार्य-व्यवहार का अवलोकन करें, तब हमारे मन में ग्लानि उत्पन्न न हो—यही सार्थक जीवन की पहचान है। फल की चिंता और आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करें l जीवन ऐसा जिएँ कि हमारे जाने के पश्चात् भी हमारी चर्चा होती रहे और हमारा जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बने l
यदि भगवान् राम और भगवान् कृष्ण के मनुष्य-जीवन के कार्य-व्यवहार का अंशांश भी हम अपने जीवन में उतार सकें, उनके आदर्शों का थोड़ा-सा भी परिपालन कर सकें, तो हमारा मनुष्य-जीवन भी शान्ति, संतोष और आत्मविश्वास के साथ व्यतीत हो सकता है। उनके जीवन से हमें यह सीखने को मिलता है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, धर्म, कर्तव्य, संयम, विवेक, प्रेम,आत्मीयता, शौर्य और पराक्रम का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
जन्मभूमि के प्रति प्रेम करना हमारा स्वाभाविक और पवित्र कर्तव्य है। इसे केवल अपने शब्दों तक सीमित न रखें, बल्कि अपने हृदय में धारण करें। जन्मभूमि के प्रति प्रेम, उसके प्रति आत्मीयता और उसके लिए कुछ करने का भाव ही रामात्मकता की अनुभूति है। रामात्मकता केवल मुख से ‘राम-राम’ कहने में नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम के आदर्शों को अपने आचरण और जीवन में उतारने में है।
जब रावण को पराभूत करके प्रभु श्रीराम अयोध्या लौट आए, तब अयोध्या नगरी में हर्ष और उल्लास की लहर दौड़ गई। वर्षों के वनवास के पश्चात् प्रभु श्रीराम के आगमन से प्रजा का हृदय आनंद से भर उठा। धर्म की विजय और अधर्म के पराभव का यह अवसर समस्त अयोध्यावासियों के लिए अत्यंत गौरव और उत्सव का विषय था।
प्रभु श्रीराम कहते हैं
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥2॥
यद्यपि सबने वैकुण्ठ की महिमा का वर्णन किया है और यह वेद-पुराणों में प्रसिद्ध तथा समस्त जगत् को ज्ञात है, तथापि अवधपुरी के समान वह भी मुझे प्रिय नहीं है। इस भेद को कोई-कोई विरला ही जानता है॥
आगे आचार्य जी ने क्या बताया,माननीय मोहन भागवत जी के Gen Z के बीच में जाने की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की, हनुमान प्रसाद जी का उल्लेख क्यों हुआ, गीता के चौथे अध्याय के किन छंदों को पढ़ने का परामर्श आचार्य जी ने दिया जानने के लिए सुनें