9.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष एकादशी/द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१८

 अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष एकादशी/द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३६ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१८


हम लोग अपनी बैठकों में देशभक्ति के गीतों का गायन भी सम्मिलित करें। इससे बैठकों में उत्साह,उमंग और राष्ट्रभाव का वातावरण बनेगा। देशभक्ति के गीत हमारे भीतर मातृभूमि के प्रति प्रेम, समर्पण और कर्तव्यबोध को जाग्रत करने का सशक्त माध्यम हैं।

आगामी अधिवेशन के माध्यम से हम समाज को एक अच्छा संदेश दें l दीनदयाल शोध संस्थान से संपर्क करके नाना जी देशमुख जी की परिकल्पना फलीभूत हो यह प्रयास करें l



जिनके रोम-रोम में रामात्मकता समा जाती है, वे संसार में रहते हुए भी संसार के भयानक दृश्यों से मुक्त रहते हैं। उनके सामने परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वे उनसे भयभीत या विचलित नहीं होते। उनमें आशा और विश्वास की कमी नहीं होती, क्योंकि उन्हें प्रत्येक परिस्थिति में भगवान राम के कार्य और भगवान राम का व्यवहार दिखाई देता है। वे मनुष्यत्व की सच्ची अनुभूति करते हैं।

भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं। उनका जीवन केवल मर्यादा का ही नहीं, अपितु अद्भुत संगठन-क्षमता और नेतृत्व का भी उदाहरण है। उनमें शौर्य, पराक्रम, तप, त्याग, करुणा, संयम, विवेक, भक्ति, भाव आदि अनेक गुण प्रकट हुए। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह दिखाया कि महान नेतृत्व केवल सामर्थ्य से नहीं, बल्कि चरित्र, संवेदना, धैर्य और सबको साथ लेकर चलने की क्षमता से निर्मित होता है भगवान राम ने विभिन्न समुदायों को एक उद्देश्य के लिए संगठित किया। यह संगठन किसी भय या स्वार्थ पर आधारित नहीं था,उसके मूल में विश्वास, प्रेम, धर्म और उद्देश्य की एकता थी।

रामात्मकता का अर्थ केवल भगवान राम का नाम लेना नहीं है। रामात्मकता का अर्थ है—अपने भीतर भगवान राम के गुणों को धारण करना। 

आज समाज और राष्ट्र के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियाँ हैं। ऐसे समय में केवल परिस्थितियों को देखकर भयभीत होना  भगवान राम का मार्ग नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रत्येक चुनौती में अपने कर्तव्य को पहचानें और अपने भीतर की शक्ति को जाग्रत करें। 

जब व्यक्ति के भीतर रामात्मकता आती है तो उसके आसपास के लोग उससे आश्वस्त होते हैं, उसमें विश्वास करते हैं और उसके साथ चलने के लिए प्रेरित होते हैं। इस प्रकार रामात्मकता व्यक्ति से परिवार तक, परिवार से समाज तक और समाज से राष्ट्र तक एक सकारात्मक शक्ति का निर्माण करती है।इसी रामात्मकता की अनुभूति के लिए प्रवेश कर जाएं राम कथा में 



राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।

बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥1क॥


श्रीराम के वनवास से लौटने में विलम्ब होने के कारण भरत का मन श्रीराम-वियोग के अथाह समुद्र में डूबा हुआ था। वे निरन्तर श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका जीवन श्रीराम के बिना ऐसा हो गया था, मानो वे विरह-सागर में डूब रहे हों और उन्हें बाहर निकलने का कोई मार्ग दिखाई न देता हो।

उसी समय पवनपुत्र हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे। तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी का वहाँ आना ऐसा था जैसे डूबते हुए व्यक्ति के लिए कोई नौका आ जाए। उन्होंने श्रीराम, लक्ष्मण और मां सीता के सकुशल अयोध्या लौटने का समाचार देकर भरत के हृदय को आशा, आनन्द और उमंग से भर दिया।

कथा में आगे आचार्य जी ने क्या बताया, मातृभूमि का हमारा क्रीड़ा- स्थल कौन सा रहा है (६:१६ )जानने के लिए सुनें l