12.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२१

 देश-प्रेम का मूल्य प्राण है, देखें कौन चुकाता है?

देखें कौन सुमन शैया तज, कंटक पथ अपनाता है?

सकल मोह ममता को तजकर, माता जिसको प्यारी हो।

दुश्मन की छाती छेदन को, जिसकी तेज़ कटारी हो।



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२१

अपनी मातृभूमि भारत के प्रति प्रेम, श्रद्धा और उत्तरदायित्व का भाव रखें इसी आधार पर हम आगामी अधिवेशन भी करने जा रहे हैं 



आचार्य जी  इन सदाचार वेलाओं द्वारा निरन्तर यह प्रयास कर रहे हैं कि हम भय और भ्रम से आक्रान्त न रहें। हम अपने प्रयासों में शैथिल्य न आने दें।

हे जगत्पिता हे जगदीश्वर संसार समन्दर पार करो 

है बीच भंवर में फंसी नाव हे उद्धर्ता उद्धार करो

 इसके लिए वे हमें चिन्तन, मनन, अध्ययन, स्वाध्याय,लेखन आदि के माध्यम से अपने भीतर स्पष्टता, आत्मविश्वास और विवेक जाग्रत करने के लिए प्रेरित करते हैं।


हम आज भी अनेक यशस्वी तपस्वी महापुरुषों को देखते हैं और उनके तप, त्याग, संयम तथा अन्य सद्गुणों से प्रभावित होते हैं। परन्तु यदि हम भगवान श्रीराम के जीवन का अध्ययन करें, तो पाएँगे कि उनमें ये सभी गुण अनन्तगुणित रूप में विद्यमान थे। भगवान श्रीराम का जीवन केवल आदर्शों को कहने का नहीं, बल्कि उन्हें अपने आचरण में उतारकर दिखाने का जीवन था। इसलिए श्रीराम के जीवन और चरित्र को समझना तथा उनके गुणों का अंशमात्र भी अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना ही हमारे जीवन को सार्थक दिशा दे सकता है l भगवान राम में शौर्य, पराक्रम,सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा, मातृ-पितृभक्ति,तप,त्याग, धैर्य, संयम, करुणा, क्षमा, विनय, मर्यादा, परोपकार, सहिष्णुता, उदारता, आत्मसंयम, देशप्रेम आदि अनेक गुण विद्यमान थे l


देशप्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को दिशा देने वाला एक महत्त्वपूर्ण विचार और जीवन-मूल्य है। जिस व्यक्ति के हृदय में अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम, श्रद्धा और उत्तरदायित्व का भाव होता है, उसके भीतर आत्मविश्वास, कर्तव्यबोध और त्याग की भावना विकसित होती है। इसके विपरीत, जिनके मन में देश के प्रति अपनत्व और निष्ठा का अभाव होता है, वे प्रायः भय, संशय, भ्रम और अस्थिरता से घिरे रहते हैं।

देशप्रेम हमें अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के विषय में सोचने की प्रेरणा देता है। यह भावना मनुष्य को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करती है और उसे राष्ट्र की उन्नति में अपना योगदान देने के लिए प्रेरित करती है।

भगवान राम का स्वदेश के प्रति प्रेम देखिये 


इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥

सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥1॥


यहाँ (विमान पर से) सूर्य कुल रूपी कमल को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य श्री रामजी वानरों को मनोहर नगर दिखला रहे हैं। वे कहते हैं- हे सुग्रीव! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुंदर है॥1॥


जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥

अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥2॥


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया मुकेश जी के किस सद्प्रयास की आचार्य जी ने प्रशंसा की, शरीर साधन है इसे आचार्य जी ने किस प्रकार स्पष्ट किया जानने के लिए सुनें l