13.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२२

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४० वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२२


परब्रह्म का सृष्टि-निर्माण  किसी आवश्यकता या अभाव की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि उसकी सहज लीला है। हम भी बिना स्वार्थ /प्रयोजन के कोई भी सत्कर्म सहज रूप से करें l

अध्यात्म में प्रवेश करें ताकि हम आत्मशक्ति को पहचान सकें l


केवल माला जपते रहना या अपने व्यक्तिगत मोक्ष की साधना में लगे रहना उचित नहीं है। यदि हमारे सामने दुष्ट सज्जनों को सताएँ, अन्याय और अत्याचार करते रहें और हम केवल यह सोचकर मौन रहें कि हम तो आध्यात्मिक साधना कर रहे हैं, तो यह पूर्ण अध्यात्म नहीं है। सच्चा अध्यात्म मनुष्य में इतना आत्मबल और धर्मबोध उत्पन्न करता है कि वह अन्याय के सामने निर्भीक होकर खड़ा हो, सज्जनों की रक्षा करे और अधर्म का प्रतिकार करने का सामर्थ्य रखे। अतः अध्यात्म के साथ शौर्य अनिवार्य है l गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के माध्यम से इसे ही स्पष्ट कियाl हम श्रीरामचरितमानस के  माध्यम से स्वयं को पहचानने का प्रयास करें। यह आत्मपहचान प्राप्त करके हम अपनी मातृभूमि के ऋण से उऋण होने के लिए सन्नद्ध हों। यही प्रार्थना हम अपने इष्टदेव से करें और इस अन्तःअनुभूति को स्थायित्व प्रदान करने की याचना भी उन्हीं से करें। श्रीरामचरितमानस वास्तव में एक अद्भुत ग्रंथ है

रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥

हमारे लिए हमारी जन्मभूमि / मातृभूमि का स्थान अत्यन्त विशिष्ट है  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम भी अपनी जन्मभूमि के प्रति गहरा अनुराग व्यक्त करते हुए कहते हैं 


 


जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥

अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥2॥

ऐसी है अवधपुरी अर्थात् अयोध्या 


अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः l



पद्मपुराण में वर्णित है 


अयोध्या च परब्रह्म सरयू सगुणः पुमान्, तन्निवासी जगन्नाथः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् l 

अयोध्या परब्रह्मस्वरूप है, सरयू सगुण पुरुषस्वरूप  अर्थात् सगुण ब्रह्म है और उसमें निवास करने वाले भगवान् जगन्नाथ हैं—मैं सत्य कहता हूँ।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने दर्शन को कैसे स्पष्ट किया, आज आचार्य जी ने मानस में क्या बताया, भगवान राम में श्रद्धा की पराकाष्ठा को आचार्य जी ने किस प्रसंग से स्पष्ट किया जानने के लिए सुनें l