प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष पञ्चमी (नाग पञ्चमी )विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८४४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२६
अपने तत्त्व को पहचानकर सत्कृत्यों को करने का संकल्प लें भ्रमित भयभीत न हों आत्मबोधोत्सव मनाएं l
हमारी दैवीय परम्परा हमें केवल श्रद्धा करना नहीं सिखाती, वह हमें देना सिखाती है। देवता का स्वभाव ही ‘देना’ है। सूर्य बिना किसी भेदभाव के प्रकाश देता है, धरती सबको धारण करती है l हमारी संस्कृति ने इसी भाव को जीवन का आदर्श माना है।
अतः आगामी अधिवेशन, जहां आनन्दपूर्वक उत्साहपूर्वक एक साथ हम एकत्र हो रहे हैं,में ‘दैवीय परम्परा’ का चिन्तन करते हुए स्वयं से यह प्रश्न करेंगे—मैं समाज को क्या दे रहा हूँ? राष्ट्र को क्या दे रहा हूँ?
अधिवेशन का संकल्प बने—‘मैं समाज और राष्ट्र के लिए कुछ दूँगा।’
आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हमारे खाद्य, पेय,भाव विचार,शुद्ध हों , हम प्रेम और आत्मीयता का विस्तार करें, शक्ति, शौर्य, पराक्रम, संगठन का सदैव ध्यान रखें, हमारा धन परोपकार में प्रयुक्त हो इसका प्रयास करें, अपने भीतर ऐसी क्षमता विकसित करें कि दुष्ट शक्ति पर हम प्रहार कर सकें, हम स्वदेश -भाव सदैव बनाए रखें l हर दशा दिशा में राम -मन्त्र की महत्ता को समझें l रामात्मकता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l भगवान राम का नाम बार बार लेने के लिए कहा जाता है उसका आशय यही है कि जब हम उनका नाम लेंगे तो उनका कार्य व्यवहार भी हमारे सम्मुख होगा l उन्होंने समाज के सारे कष्ट दूर कर दिए l उन्होंने बहुत कुछ किया l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अयोध्या में होने जा रहे राजतिलक के वर्णन में क्या बताया
दूसरा बैल चारा क्यों नहीं खाता था,भैया मनीष कृष्णा जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी, भैया संजय गर्ग जी और भाभी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l