24.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३३

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३३

अपनी समीक्षा प्रतिदिन करें  ताकि हम संगठन के लिए उपयुक्त हो सकें l 



आचार्य जी नित्य हमें प्रेरित कर रहे हैं, ताकि हमारा मन, हमारी बुद्धि, हमारी भावनाएँ और हमारे विचार स्वदेशोन्मुखी बनें। हमारे भीतर अपने देश के प्रति प्रेम, निष्ठा, आत्मीयता और उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत हो तथा हमारा प्रत्येक चिंतन और प्रत्येक प्रयास राष्ट्रहित और भारत के उत्थान की दिशा में प्रवाहित हो। इसके लिए संगठित  महाशक्ति आवश्यक है l हम अपने संगठन में प्रेम और आत्मीयता का विस्तार करें, क्योंकि प्रेम ही हम सदस्यों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करता है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ अपनापन, विश्वास और सहयोग जन्म लेते हैं। जब हम अपने सुख-दुःख को केवल अपना न मानकर दूसरों के सुख-दुःख से संयुत करते हैं , तब आत्मीयता का विस्तार होता है।


अनेक हृदय जब प्रेम और आत्मीयता के सूत्र में बँधते हैं, तो वे केवल व्यक्तियों का समूह नहीं रहते, बल्कि एक संगठित महाशक्ति का रूप धारण कर लेते हैं। इसलिए प्रेम बढ़ाएँ, परस्पर आत्मीयता जगाएँ और एक-दूसरे के प्रति विश्वास तथा सहयोग की भावना विकसित करें; क्योंकि प्रेम से जुड़े जन ही संगठित होकर राष्ट्र और समाज की महान शक्ति बनते हैं। हम अपना कार्य-व्यवहार ऐसा न रखें कि हम किसी से रुष्ट हों और कोई हमसे रुष्ट हो। हमारा व्यवहार ऐसा हो, जिसमें प्रेम, आत्मीयता, मधुरता और परस्पर सम्मान बना रहे।

रामराज्य में प्रेम और आत्मीयता का इतना अधिक विस्तार था कि सबके मन भगवान श्रीराम के चरणों में अनुरक्त थे। वानरगण ब्रह्मानन्द में निमग्न रहते हुए दिन-रात का भेद तक भूल गए। देखते-ही-देखते छह महीने बीत गए, पर उन्हें ऐसा लगा मानो अभी कुछ ही समय हुआ हो।


ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।

जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति॥15॥

हम पहुंच गये हैं अयोध्या में जब भगवान राम का राज्याभिषेक हो चुका है और हर स्थान पर आनन्द ही आनन्द है l

भगवान राम उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण कराते हैं जब सब एक ही स्थान पर रहेंगे तो संपूर्ण देश की सुरक्षा कैसे होगी 


अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।

सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम॥16॥

हे सखाओ! अब आप सब अपने-अपने घर जाइए और मेरा दृढ़ नियमपूर्वक भजन करते रहिए अर्थात् मेरा कार्य व्यवहार स्मरण करते रहिए । मुझे सर्वत्र व्याप्त, सबका हित करने वाला जानकर मुझसे सदा अत्यन्त प्रेम रखिए l


इसके अतिरिक्त चैतन्य पात्र क्या है बीर बहूटी (Red Velvet Mite )का उल्लेख क्यों हुआ रामत्व क्या है जानने के लिए सुनें l