प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८५२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३४
प्रेम, परस्पर आत्मीयता और अटूट विश्वास—यही हमारे सनातन धर्म के मूल तत्त्व हैं; यही उसका सत्त्व, उसकी शक्ति और उसकी जीवन-दृष्टि हैं।
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥4॥
पुत्र, धन, स्त्री, गृह एवं परिवार- ये संसार में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु संसार में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदय में ऐसा विचार कर हे तात! जाग जाएं ॥
शिक्षाप्रद श्रीरामचरितमानस का पाठ करते समय इन भावों को केवल शब्दों में न पढ़ें, अपितु अपने हृदय में आत्मसात् करें l श्रीरामचरितमानस का प्रत्येक अंश सनातन जीवन-दृष्टि और वैदिक ज्ञान से अनुप्राणित है। उसमें केवल भगवान श्रीराम की कथा नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, कर्तव्य, मर्यादा, प्रेम, आत्मीयता, करुणा, त्याग, सेवा,शौर्य, पराक्रम,लोकमंगल और आत्मसंयम जैसे सनातन सिद्धान्तों का सजीव प्रतिपादन मिलता है।
उस समय का भारत अनेक प्रकार की विडम्बनाओं और संकटों से ग्रस्त था। राजा दशरथ और जनक अपने-अपने राजधर्म और राज्य-व्यवस्थाओं में सीमित थे। दूसरी ओर रावण की सत्ता और उसके हस्तकों का अत्याचार दूर-दूर तक फैल रहा था। ऋषि-मुनि, तपस्वी और सामान्य जन उसके अत्याचारों से त्रस्त थे। समाज विभिन्न शक्तियों और स्वार्थों में बँटा हुआ था।
ऐसे समय में भगवान श्रीराम समस्त भारत को धर्म, मर्यादा, प्रेम और आत्मीयता के एक सूत्र में बाँधने वाले लोकनायक के रूप में सामने आते हैं। उन्होंने वनवास के माध्यम से जन-जन से सम्पर्क स्थापित किया, ऋषियों की पीड़ा को समझा, वनवासी समाज को आत्मीयता दी और विभिन्न समुदायों तथा शक्तियों को धर्म के पक्ष में संगठित किया।
श्रीराम का जीवन हमें यह संदेश देता है कि जब समाज विखण्डित हो और अधर्म का प्रभाव बढ़ रहा हो, तब प्रेम, विश्वास, आत्मीयता और धर्म ही वह शक्ति है जो सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में बाँध सकती है।
यही भगवान राम अब सिंहासनासीन हैं किन्तु उन्हें अब भी ध्यान है कि उनके सखा सुग्रीव, विभीषण, अंगद आदि का कर्तव्य क्या क्या है
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।.....
उन्हें वस्त्र आदि पहनाए जा रहे हैं
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥
अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥4॥
सब अपने हृदयों में श्री रामचंद्रजी के रूप को धारण करके उनके चरणों में मस्तक नवाकर चले॥
अंगद प्रेम की पराकाष्ठा है समर्पण का विग्रह है इस कारण अंगद बैठे ही रहे, वे अपने स्थान से हिले तक नहीं। उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभु ने उनको नहीं बुलाया l
अंगद कहता है
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥
मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥1॥
हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुख के समुद्र! हे दीनों पर दया करने वाले! हे आर्तों के बंधु! सुनिए! हे नाथ! मरते समय मेरे पिता बालि मुझे आपकी ही गोद में डाल गए थे l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अधिवेशन के विषय में क्या बताया,उन्नाव विद्यालय की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की जानने के लिए सुनें l