26.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष त्रयोदशी / चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष त्रयोदशी / चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५३ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३५

भक्ति की भावना में रमते हुए अपने भारत देश की भक्ति में रमें और उसके अनुसार कार्य व्यवहार करें l




जिसे यह अनुभव होने लगे कि मैं अभी पूर्ण नहीं हूँ, मेरे भीतर सुधार की आवश्यकता है समझ लीजिए, उसने भक्ति की दिशा में पहला पग उठा दिया है। क्योंकि भक्ति का आरम्भ ही अपने दोषों को देखने, अपनी अपूर्णता को स्वीकार करने और स्वयं को परम सत्ता के सम्मुख सुधारने की आकांक्षा से होता है।

भक्ति को यदि हम दुर्बलता, पलायन या केवल भावुकता के रूप में देखते हैं, तो समझ लेना चाहिए कि हमने भक्ति के वास्तविक स्वरूप को जाना ही नहीं है। भक्ति मनुष्य को निर्बल नहीं बनाती, बल्कि उसके भीतर अद्भुत आत्मबल, धैर्य,शौर्य, पराक्रम और संकल्पशक्ति का संचार करती है। भक्ति में अपार शक्ति है—वह असम्भव को सम्भव करने का सामर्थ्य रखती है।भगवान राम की भक्ति हमें यह सिखाती है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना है। उनकी भक्ति हमें अपने भीतर झाँकना सिखाती है। इसी कारण भगवान राम हमारे आदर्श हैं उनकी भक्ति धर्म के लिए खड़े होने की शक्ति पैदा करती है।

अयोध्या कांड में एक प्रसंग है भगवान राम वाल्मीकि जी के आश्रम में पहुंचे हैं वहां ऋषि वाल्मीकि जी कहते हैं 

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।

जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥

जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।

सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥


और भगवान राम ने जैसा कहा था 

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

करके भी दिखाया l अब वे सिंहासनासीन हैं छह माह बीत गये भगवान राम सखाओं का उनके कर्तव्य का स्मरण कराते हुए विदा कर रहे हैं यहां भक्त अंगद का प्राप्तव्य देखिये 

सर्वज्ञ! हे कृपा और सुख के समुद्र! हे दीनों पर दया करने वाले! हे आर्तों के बंधु! सुनिए! हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोद में डाल गए थे इस कारण मुझे त्यागिए नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता सब कुछ आप ही हैं। आपके चरणकमलों को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँगा l 

भगवान राम के नेत्र सजल हो जाते हैं l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भक्ति की ओर कौन गृहस्थ उन्मुख रहते हैं

जानने के लिए सुनें l