27.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष चतुर्दशी /पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३६

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष चतुर्दशी /पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५४ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३६

यह संसार एक नाट्य मञ्च है इसमें हम अपना अभिनय मनोयोगपूर्वक करें 


श्रीरामचरितमानस का अध्ययन तभी सार्थक है, जब हम उसे केवल पढ़ें नहीं, बल्कि अपना विवेक जाग्रत करके उसके प्रत्येक प्रसंग को समझने का प्रयास करें। मानस हमें अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है।

यदि हम भगवान श्रीराम के आचरण में दोष खोजें, उनके निर्णयों पर प्रश्नचिह्न लगाएँ तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और घृणित विचार दूसरा नहीं हो सकता। श्रीराम के चरित्र को अपने सीमित दृष्टिकोण से कसौटी पर कसने के स्थान पर हमें अपने जीवन को उनके आदर्शों की कसौटी पर कसना चाहिए l


रामात्मक संदेश की अनुभूति कर हम अपने शरीर, मन, बुद्धि को समाज और देश की सेवा  साधना में सन्नद्ध करें अपने विकारों का निरसन करें सद्विचारों को ग्रहण कर यशस्विता प्राप्त करें आचार्य जी नित्य इसी के प्रयास हेतु अपना बहुमूल्य समय देते हैं l आचार्य जी कहते हैं 



शक्ति संयम साधना पर ध्यान हो ,

मानवोन्नति ध्यानयुक्त विधान हो, 

हर जगह शुभ आचरण का मान हो, 

सुखी सब सुन्दर विरुज का ज्ञान हो,

हर तरह के ज्ञान का सम्मान हो, 

मानवीय समाज ज्ञान निधान हो ॥

 आइये इसी भूमिका का ध्यान रखते हुए अब रामकथा में प्रवेश करें 

अयोध्या राज्य के अतिथि अब विदा किए जा रहे हैं  वे एक स्थान पर एकत्र हो रहे हैं क्योंकि अभी अंगद को भी साथ जाना है जो जाना नहीं चाहता है 

भगवान राम अंगद को स्वयं लेकर जा रहे हैं 


भरत अनुज सौमित्रि समेता। पठवन चले भगत कृत चेता॥

अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा॥1॥


विरह-वेदना और गहन आत्मीयता का अद्भुत चित्रण  जिसमें भक्त अपने आराध्य से अलग होते हुए बार-बार उनकी ओर देखता है।अंगद बार-बार दण्डवत प्रणाम करते हैं। मन में ऐसा आता है कि श्री रामजी मुझे रहने को कह दें। वे श्री रामजी के देखने की, बोलने की, चलने की तथा हँसकर मिलने की रीति को याद कर-करके सोचते हैं और दुःखी होते हैं किन्तु  भगवान राम तो जब किसी कार्य में रमते हैं तो उसे पूर्ण करके ही मानते हैं वे अंगद को वहां ले   जाते हैं l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भैया पंकज जी, भैया पवन जी का उल्लेख क्यों हुआ, ३० अगस्त ३१ अगस्त और १ सितंबर की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की जानने के लिए सुनें l


{ परम आत्मीय मेरे युगभारती के परिवारी जन  !!!

दिनांक ३० अगस्त २०२६(रविवार) को मेरे अग्रज ( पूज्य दादा जी) की निन्यानबे वीं जयन्ती है। 

कार्यक्रम प्रातः १० बजे उनकी मूर्ति के अनावरण से प्रारंभ होकर रात्रि ९ बजे कविगोष्ठी के समापन तक चलेगा। 

मैं आप सभी को आदर और प्रेम के साथ इस भावपूर्ण आयोजन में उपस्थित रहने के लिए व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित कर रहा हूँ। 

आपकी माध्यमिक शिक्षा का शिक्षक 

                  ओम शङ्कर 

सभी कार्यक्रम उन्नाव के सिविल लाइन्स स्थित सरस्वती विद्यामंदिर में सम्पन्न होंगे।}