रक्षाबन्धन पर्व है, प्रेम और विश्वास।
ये दोनों गुण धर्म हैं,मानवता की श्वास ॥
रक्षाबन्धन पर्व की मंगलकामनाएँ-----
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८५५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३७
अपने को देख पाने वाला एकांत खोजिए। आत्मदर्शन का प्रयास कीजिए l
चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्
हम प्रायः व्यर्थ की चिंताओं और निरर्थक विचारों में अपना बहुमूल्य समय गँवा देते हैं। हम दूसरों को देखने, उनकी चर्चा करने और संसार को समझने में जितना समय व्यतीत करते हैं , उसका कुछ अंश भी यदि हम अपने भीतर झाँकने, अपने विचारों को परखने और अपने जीवन की दिशा पर विचार करने में लगाएँ, तो हमारा जीवन अधिक सार्थक हो सकता है।
एकांत स्वयं से साक्षात्कार का अवसर है। वहीं हमें अपने वास्तविक स्वरूप, अपने कर्तव्य और अपने जीवन के उद्देश्य को देखने की दृष्टि मिलती है।
हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी,
आओ, विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।
भारत देश अद्भुत है अप्रतिम है l अनेक महान संस्कृतियाँ और सभ्यताएँ काल के प्रवाह में विलीन हो गईं, उनके नगर उजड़ गए, उनकी परम्पराएँ समाप्त हो गईं और धीरे-धीरे उनका अस्तित्व तक मिट गया। किन्तु भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता है, जिसने असंख्य उतार-चढ़ावों, आक्रमणों और विपरीत परिस्थितियों के पश्चात् भी अपनी सांस्कृतिक चेतना को जीवन्त बनाए रखा।
भारत की शक्ति उसकी सनातन जीवन-दृष्टि, ज्ञान-परम्परा, परिवार-व्यवस्था, संस्कार, धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना में निहित रही है। राजवंश बदले, शासन बदले, परिस्थितियाँ बदलीं, परन्तु भारत की आत्मा बनी रही इस चिरन्तन यात्रा में तात्विक उपासना में रत अनेक आत्मदर्शियों, ऋषियों,मुनियों, तपस्वियों, वीरों, चिन्तकों, आचार्यों और महापुरुषों की महान भूमिका रही l
अकबर के शासनकाल में भी धार्मिक-सांस्कृतिक सम्बन्धों का एक जटिल दौर दिखाई दिया सनातन धर्म को विनष्ट करने के प्रयास होते रहे l
ऐसे ही चुनौतीपूर्ण समय में गोस्वामी तुलसीदास का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने श्रीराम
(मेरे राम फेर दो कृपा कटाक्ष भारत पर,
होवे भूमि प्रेममयी अमरित के गागर सी ॥)
के चरित्र और रामभक्ति के माध्यम से जन-जन में धर्म, मर्यादा, सदाचार, कर्तव्य और आत्मविश्वास की चेतना जगाई।
रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥
रामायण काल में किस पात्र ने दक्षिण भारत को पुनः संगठित किया था, निषादराज ने राजा दशरथ से राजप्रासाद में क्या कहा था,कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया,जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी का कौन सा प्रसंग बताया जानने के लिए सुनें l