3.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१२

 ज्योत से ज्योत जगाते चलो,

ज्योत से ज्योत जगाते चलो

प्रेम की गंगा बहाते चलो,

प्रेम की गंगा बहाते चलो

राह में आये जो दीन दुखी,

राह में आये जो दीन दुखी

सब को गले से लगाते चलो,

प्रेम की गंगा बहाते चलो l 


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१२

दुर्भाग्यवश विकृत शिक्षा के प्रभाव से आज हमारे सनातनधर्मी समाज में अनेक स्थानों पर वृद्धजनों के प्रति सम्मान की भावना क्षीण होती जा रही है, जबकि वास्तव में उनका आदर किया जाना चाहिए। वृद्धजन जीवन के दीर्घ अनुभवों के धनी होते हैं। उनके पास अनेक प्रकार की परिस्थितियों से जूझने की सफलताओं और असफलताओं का संचित अनुभव तथा उनसे प्राप्त जीवनोपयोगी शिक्षाओं की अमूल्य निधि होती है अतः हमें श्रद्धापूर्वक उनकी बातों को सुनना चाहिए और उनके अनुभवों से सीख ग्रहण करनी चाहिए ताकि हमें उचित मार्गदर्शन और लाभ प्राप्त हो l 



हम सौभाग्यशाली हैं कि आचार्य जी से हमें मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है  हमें श्रद्धापूर्वक उनकी बातों को सुनकर लाभ उठाना चाहिए आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम अपनी अपनी बुद्धियों, विचारों और भावों को मिलाते हुए संगठित रहने का प्रयास करें , परिवार और संगठन की उपेक्षा न करें,अपना कर्मचैतन्य सदैव जाग्रत रखें, उपासना के अभ्यासी बनें l

जीवन में समस्याओं से पलायन नहीं, अपितु उनके समाधान का  हमें प्रयास करना चाहिए। भगवान श्रीराम ने भी मनुष्य रूप में अवतार लेकर जीवन की अनेक कठिन परिस्थितियों का धैर्य, मर्यादा,संकल्प,पुरुषार्थ, शौर्य, पराक्रम और धर्म के आधार पर सामना किया तथा उनके आदर्श समाधान प्रस्तुत किए l हर परिस्थिति में उन्होंने अपने को गलाया और दूसरों को लाभ पहुंचाया l

आजकल हम लोग सद्गुणों को प्राप्त करने के लिए और दुर्गुणों के निरसन के लिए उन्हीं की कथा सुन रहे हैं और इस समय लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

भीषण युद्ध चल रहा है


"हे उमा! जिनकी मात्र इच्छा से स्वयं काल (मृत्यु) भी नष्ट हो जाता है, वही सर्वशक्तिमान श्रीराम अपने सेवक विभीषण की प्रेम-निष्ठा की परीक्षा लेने जा रहे हैं।"


उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥


तब विभीषण अत्यन्त विनम्र होकर निवेदन करते हैं—

"हे सर्वज्ञ! हे समस्त चराचर जगत् के स्वामी! हे शरणागतों के रक्षक! हे देवताओं और मुनियों को सुख देने वाले प्रभो! मेरी विनती सुनिए।"


सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥


इसके नाभिकुंड में अमृत का निवास है। हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है। विभीषण के वचन सुनते ही कृपालु रघुनाथ ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिए।

और इस प्रकार रावण का अन्त हो जाता है l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भालका तीर्थ की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l