केवल मानव का शरीर पर कर्म सहज जीवों जैसे,
जीवन भर न जान पाते हैं सचमुच रहना है कैसे,
करें जागरण ब्रह्मकाल में तन का प्रथम मार्जन हो,
चलते -फिरते ध्यान धारणा संयम युक्त धनार्जन हो।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८३१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१३
हमारा जन्म भारत में हुआ है, जो अत्यन्त पवित्र, दिव्य और पुण्यभूमि है। यह परमात्मा की महान कृपा है। अतः हमें जीवन में आरत (आर्त ) नहीं होना चाहिए; अपितु इस दिव्य जन्म का सदुपयोग धर्म, सदाचार, साधना और लोकमंगल के लिए करना चाहिए।
वन-पथ पर चलने वाले प्रभु राम का जब हम ध्यान करेंगे , साधना में रत होंगे , तब हमारे भीतर भी वही शक्ति, धैर्य, शौर्य, पराक्रम,धर्मनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति का उदय होगा। क्योंकि वनवास के प्रभु राम हमें सिखाते हैं कि विपरीत परिस्थितियाँ हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि महान और यशस्वी बनाने के लिए आती हैं। जो प्रभु राम वन में भी मर्यादा, करुणा और कर्तव्य से विचलित नहीं हुए
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥
, उन्हीं का चिंतन हमारे जीवन में आत्मबल, संयम, सकारात्मक सोच और विजय का प्रकाश भर देता है।हमारे भीतर भी वही आत्मतत्त्व है जो नर लीला कर रहे प्रभु राम में था l
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थो न वेदो न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ll
आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं
रोचक तथ्य यही है कि रावण जिसे भगवान राम ने अभी अभी मार डाला है, के भीतर भी वही विद्यमान था यही संसार का स्वरूप है l इस आत्मतत्त्व की उपस्थिति यह स्मरण कराती है कि दिव्यता सबमें समान रूप से विद्यमान है; अंतर केवल उसे पहचानने और उसके अनुरूप जीवन जीने में है।
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥
लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥
डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,आचार्य जी ने अपने अध्यापक श्री निशानाथ जी दीक्षित की चर्चा क्यों की,चन्दबरदाई का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l