तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।
भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥116 क॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८३३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१५
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गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना ऐसे समय में की, जब देश की परिस्थितियाँ अकबर के शासन के कारण अत्यन्त विषम थीं। समाज विखंडित था, धर्म के प्रति श्रद्धा क्षीण हो रही थी, नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा था और जनमानस निराशा से घिरा हुआ था। ऐसे समय में तुलसीदास जी ने श्रीराम के आदर्श चरित्र के माध्यम से समाज में धर्म, मर्यादा, सदाचार, समरसता, आत्मविश्वास और लोकमंगल की चेतना का पुनर्जागरण किया l रामकथा केवल सुनते हुए आनन्द लेने मात्र का विषय नहीं है , अपितु आत्म-जागरण का दिव्य साधन है। उसका वास्तविक लाभ तभी प्राप्त होता है जब हमारे अंतःकरण में भाव-परिवर्तन हो l अहंकार, राग-द्वेष और स्वार्थ का क्षय होकर श्रीराम के गुण हमारे जीवन में प्रकट होने लगें। यही रामात्मकता की प्राप्ति है।
जब समस्त सृष्टि में प्रभु का दर्शन होने लगे, समाज और राष्ट्र भगवान् की विराट् देह प्रतीत होने लगें , जब हमारे विचार, वाणी और आचरण में मर्यादा, करुणा, सत्य, प्रेम, त्याग, शौर्य, पराक्रम का प्रकाश झलकने लगे, जब हमें मनुष्यत्व की अनुभूति होने लगे,तभी समझना चाहिए कि रामकथा ने हृदय में अपना दिव्य प्रभाव स्थापित कर दिया है। यही रामकथा का वास्तविक प्रसाद और परम फल है।
युद्ध समाप्त हो चुका है । रावण लगभग अपने सारे कुल सहित विनष्ट हो गया है । विभीषण का राज्याभिषेक हो चुका है । लंका का समस्त वैभव प्रभु श्रीराम के चरणों में समर्पित है । विनम्र भाव से विभीषण ने निवेदन किया—"प्रभो! यह सम्पूर्ण राज्य, यह ऐश्वर्य, यह संपत्ति—सब आपकी ही है।"
किन्तु श्रीराम का हृदय वैभव में नहीं, प्रेम में स्थित था। उन्होंने संकेत दिया कि उन्हें इन सबमें तनिक भी आकर्षण नहीं है। उनके मन में तो केवल भरत का स्मरण था। वे बार-बार कहते हैं कि भरत के वियोग में बीतता हुआ प्रत्येक निमिष उन्हें कल्प के समान दीर्घ प्रतीत हो रहा है। अब विलम्ब सहन नहीं होता; शीघ्र अयोध्या पहुँचकर अपने प्रिय भ्राता भरत से मिलना ही उनकी एकमात्र अभिलाषा है।
भगवान् राम विभीषण से कहते हैं
"हे सखा! भरत तपस्वी का वेश धारण किए हुए हैं, मेरा निरंतर जप करते-करते उनका शरीर अत्यन्त कृश हो गया होगा। मैं उन्हें शीघ्र देखना चाहता हूँ। इसलिए ऐसा उपाय करो कि मैं तुरंत उनसे मिल सकूँ। मैं तुमसे विनयपूर्वक प्रार्थना करता हूँ।"
कथा में आगे आचार्य जी ने क्या बताया,भक्त का बल भगवान का बल किस प्रकार है, भैया मोहन जी का उल्लेख नागपुर के साथ क्यों हुआ, श्री अनिल जायसवाल जी कौन हैं, आज आचार्य जी कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें l