प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८३४ वां* सार -संक्षेप
स्थान : महातीर्थ चित्रकूट
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१६
हमें ऐसी भक्ति प्राप्त हो जिसमें भोग, ऐश्वर्य अथवा किसी भी फल की आकांक्षा न हो।
आजकल हम लोग राम -कथा में प्रविष्ट हैं l
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं।
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥2॥
श्रीरामचरितमानस ऐसा दिव्य प्रेम-सरोवर है, जो पापों का नाश करता है, कल्याण प्रदान करता है, आत्मज्ञान और भक्ति देता है, माया-मोह को दूर करता है तथा संसार के दुःखों की दाह से मनुष्य की रक्षा करता है। जो श्रद्धापूर्वक इसमें अवगाहन करते हैं, उनका जीवन शान्त, पवित्र और परम मंगलमय हो जाता है।
समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।
बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान॥121 क॥
जो विवेकशील, श्रद्धावान और समझदार व्यक्ति भगवान श्रीराम के समर-विजय के चरित्र को सुनते, पढ़ते और मनन करते हैं, उन पर भगवान की विशेष कृपा होती है। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रकार का समर है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे शत्रुओं से तथा बाहर अनेक प्रकार की विपरीत परिस्थितियों, अत्याचारों , प्रलोभनों और कठिनाइयों से निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है। भगवान श्रीराम का जीवन सिखाता है कि इन सभी संघर्षों में धर्म, मर्यादा, धैर्य, सत्य, तप, त्याग, शौर्य,पराक्रम और संगठित शक्ति की आवश्यकता होती है l
विवेक के द्वारा मनुष्य सत्य और असत्य, कर्तव्य और अकर्तव्य, धर्म और अधर्म, स्थायी और अस्थायी का उचित निर्णय कर पाता है। बिना विवेक के प्राप्त विजय भी अहंकार और पतन का कारण बन सकती है। इसलिए भगवान पहले मनुष्य के अन्तःकरण को प्रकाशित करते हैं।
विभूति का अर्थ केवल धन-सम्पत्ति नहीं है। यहाँ विभूति का आशय सद्गुणों, उत्तम चरित्र, यश, सम्मान, लोकमंगल की भावना, आध्यात्मिक उन्नति तथा ईश्वर-कृपा से प्राप्त समस्त दिव्य सम्पदा से है। जहाँ विवेक होता है, वहीं विभूति भी मंगलकारी बनती है जो व्यक्ति निरन्तर श्रीराम के चरित्र का श्रद्धापूर्वक श्रवण और मनन करता है, उसके जीवन में प्रतिदिन नए रूप में विजय, विवेक और विभूति का विकास होता रहता है।
पुष्पक विमान लंका से चल दिया हैl
भगवान श्रीराम सीताजी को युद्धभूमि तथा लंका के प्रमुख स्थान दिखाते हैं।समुद्र और रामसेतु का दर्शन कराते हैं।मार्ग में विभिन्न ऋषियों के आश्रमों और पवित्र स्थलों का दर्शन कराया जाता है।श्रीराम हनुमानजी को नन्दिग्राम भेजते हैं ताकि वे भरत को आगमन का शुभ समाचार दें।
हनुमानजी भरत को संदेश देते हैं। भरत का विरह समाप्त होता है और वे अत्यन्त आनन्दित होते हैं।पुष्पक विमान नन्दिग्राम पहुँचता है।
बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर॥116 ग॥
चारों भाइयों का भावपूर्ण मिलन होता है।
और आचार्य जी ने क्या बताया, चित्रकूट की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l