यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ १८.७८॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८६८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५०
इन उद्बोधनों को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि इनके माध्यम से संसार में जीने की श्रेष्ठ शैली सीखना, जीवन को सार्थक और यशस्वी बनाने का प्रयास करना हमारा ध्येय हो। हम निरन्तर भारत माता की सेवा में रत रहें और अपने प्रत्येक कर्म को राष्ट्रहित से जोड़ें।
आगामी अधिवेशन के लिए अपनी तैयारियों को चरम पर पहुँचाएँ।
चिन्तन, मनन, अध्ययन और स्वाध्याय केवल ज्ञान अर्जित करने के साधन नहीं हैं। इनका वास्तविक उद्देश्य है—अपने भीतर शक्ति का जागरण करना, अपने चैतन्य को जाग्रत करना और जीवन को अधिक सजग, समर्थ एवं सार्थक बनाना।
ज्ञान हमारे आचरण और कर्म में दिखाई देना चाहिए; केवल अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना उसका उद्देश्य नहीं है।
अतः हम ज्ञान को संग्रहित करने के साथ-साथ उसे जीवन में उतारने और समाज तथा राष्ट्र के हित में प्रयुक्त करने का प्रयास करें l
संसार में व्याप्त उन विकारों और प्रवृत्तियों का दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध करना हमारा कर्तव्य है, जो सनातन धर्म ,जिसमें संसार संसार के सार और संसारेतर जीवन का चिन्तन है,जिसमें आत्मस्वरूप का बोध है,जो बताता है कि हम कभी मरते नहीं हैं,के मूल्यों को नष्ट करने, समाज को विभाजित करने अथवा भारतमाता के प्रति वैरभाव उत्पन्न करने का प्रयास करती हैं।
ऐसी प्रवृत्तियों के सामने निश्चेष्ट होकर बैठ जाना हमारा धर्म नहीं है। अन्याय और अधर्म का विधिसम्मत एवं दृढ़ प्रतिकार करना आवश्यक है। जो जहाँ है, वह अपने सामर्थ्य, विवेक और मर्यादा के अनुसार धर्म, समाज और राष्ट्र की रक्षा में योगदान दे। अतः हमारा संकल्प हो कि हम स्वयं भगवान राम, जिन्होंने मनुष्य का अवतार लेकर हमें दिशा दर्शन प्रदान किया,के आदर्शों से प्रेरणा लेकर धैर्य, शौर्य, विवेक, संयम और संगठन के साथ अधर्म का प्रतिरोध करेंगे और धर्म तथा राष्ट्रहित की स्थापना के लिए सतत कर्मरत रहेंगे।
क्या माया के कारण ही सृष्टि की रचना संभव है? सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥
जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥1॥ का उल्लेख करते हुए अनपायनी को कैसे आचार्य जी ने स्पष्ट किया?, मानसिंह का चित्र क्यों नहीं लगाते? जानने के लिए सुनें l