सनातन धर्म पर विश्वास भारत की निशानी है,
अतुल पौरुष पराक्रम त्याग तप इसकी कहानी है,
हुआ जिसको कोई भ्रम इस विषय पर सच समझ लो वह,
कोई भटका हुआ बहुरूपिया व्याकुल गुमानी है ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८६७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४९
रामकथा से प्राप्त प्रकाश को अपने तक सीमित न रखकर भारतवर्ष के कालुष्य को दूर करने के लिए संकल्पित हों और उसके लिए सतत कर्म करें।आगामी अधिवेशन भी इसी उद्देश्य हेतु है l
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥
सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥1॥
जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥
ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥2॥
सनातन धर्म का कथात्मक चिन्तन वास्तव में अद्भुत और अत्यन्त गहन है। यह केवल कथा सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन, कर्म, आत्मा और परमात्मा के रहस्यों को समझने का मार्ग है। इसलिए इसे सहज बुद्धि से तुरंत समझ लेना सम्भव नहीं होता।
जिनकी बुद्धि अभी अत्यधिक सांसारिक विषयों में उलझी हुई है, वेद, पुराण,उपनिषद् आदि उन्हें कठिन और नीरस प्रतीत होते हैं। वे उनसे ऊबने लगते हैं और उनसे दूर भागते हैं। वस्तुतः यह ऊबना उनके कर्मों का भोग है।
बालि इसका सटीक उदाहरण है। जब तक उसका अन्तकाल नहीं आया, तब तक वह भगवान् श्रीराम के कार्य और अपने कर्म के गूढ़ सत्य को पूर्णतः नहीं समझ सका।
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥2॥
यदि उसे पहले ही वह ज्ञान प्राप्त हो गया होता, तो सम्भवतः वह अपने जीवन में अपकर्म नहीं करता
ज्ञान का उदय संसार छोड़ने के पश्चात् ही हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। संसार में रहते हुए, अपने कर्मों को करते हुए यदि किसी मनुष्य के भीतर सत्य का बोध जाग जाए, जीवन का वास्तविक उद्देश्य दिखाई देने लगे, परमात्मा की ओर उसकी दृष्टि मुड़ जाए, उसे रामात्मकता का अनुभव होने लगे तो इससे बड़ा सौभाग्य उसके लिए क्या हो सकता है?
हम अपने दैनिक क्रियाकलापों में विविध रूपों से रामात्मकता के दर्शन करने के अभ्यासी बनें। जीवन की प्रत्येक घटना, प्रत्येक सम्बन्ध, प्रत्येक कर्तव्य और प्रत्येक परिस्थिति में श्रीराम के किसी न किसी स्वरूप को पहचानने का प्रयास करें।
हमारा लक्ष्य केवल रामकथा सुनना न हो, बल्कि अपने जीवन को राममय दृष्टि से देखना होl कठिन परिस्थितियों में धैर्य, विपत्ति में विवेक, कर्तव्य के प्रति निष्ठा, वचन-पालन, सत्यनिष्ठा, मर्यादा, करुणा, क्षमा,शौर्य, पराक्रम,शरणागतवत्सलता, संगठन-कौशल और लोकहित, देशहित के प्रति पूर्ण उत्तरदायित्व—ये प्रभु राम के वे गुण हैं, जिन्हें हम ग्रहण कर सकते हैं धीरे-धीरे यही अभ्यास हमारे दृष्टिकोण को बदल देगा। तब प्रभु राम केवल मन्दिर में पूजित होने वाले आराध्य नहीं रहेंगे, बल्कि हमारे विचार, व्यवहार, कर्म और जीवन-दृष्टि में निरन्तर प्रकट होने लगेंगे।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आज किस फिल्म की चर्चा की, विषय विशेषज्ञ का उल्लेख क्यों हुआ, रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वामी विवेकानन्द जी को क्या लक्ष्य बताया जानने के लिए सुनें l