13.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीया / तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५३

 [13/09, 06:48] Praveen: प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  द्वितीया / तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५३


यह भारतभूमि अद्भुत है। असंख्य संकटों को झेलकर भी यह बार-बार विश्वास, धैर्य और आत्मशक्ति के साथ खड़ी हो जाती है। विषम से विषम, गम्भीर से गम्भीर और भयानक परिस्थितियाँ भी इसकी जीवनधारा को रोक नहीं सकीं।

ऐसे ही एक अत्यन्त कठिन काल में, जब अकबर का शासन था और सनातन धर्म के सम्मुख अनेक प्रकार की चुनौतियाँ उपस्थित थीं, चिन्तक और विचारक व्याकुल थे—सनातन धर्म कैसे सुरक्षित रहे? हमारी संस्कृति कैसे बचे? देश की आत्मा को कैसे जीवित रखा जाए?

ऐसे कालखण्ड में महामनीषी गोस्वामी तुलसीदासजी का प्राकट्य हुआ और श्रीरामचरितमानस जैसी अमर कृति का निर्माण हुआ। मानस ने केवल कथा नहीं सुनाई; उसने समाज को आस्था, मर्यादा, पुरुषार्थ, संगठन, त्याग, शौर्य, पराक्रम और राष्ट्रबोध की शक्ति प्रदान की।

तुलसीदासजी स्वयं कहते हैं—

नौमी भौम बार मधुमासा।

अवधपुरी यह चरित प्रकासा॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं।

तीरथ सकल जहाँ चलि आवहिं॥

तुलसीदास जी के गुरु थे नरहर्यानंद दास जी l

 गुरु और शिष्य तुलसीदासजी का सम्बन्ध केवल औपचारिक शिक्षा का सम्बन्ध नहीं था; यह जीवन-निर्माण और साधना का सम्बन्ध था। गुरु ने तुलसीदासजी के भीतर सुप्त सामर्थ्य को जाग्रत किया और वही सामर्थ्य आगे चलकर करोड़ों लोगों के जीवन का आलोक बना।

हमारी परम्परा में गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं है; वह जीवन की दिशा देने वाला, अन्तःशक्ति को जगाने वाला और साधना को लोकमंगल से जोड़ने वाला होता है।

यह देश केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है।

हमारे भीतर यह भाव जागना चाहिए—

यह देश मेरा, धरा मेरी, गगन मेरा;

इसके लिए समर्पित हो जीवन मेरा।

इस राष्ट्र की रक्षा और उसकी सनातन चेतना को अक्षुण्ण रखने के लिए असंख्य ज्ञात-अज्ञात महापुरुषों ने अपना जीवन अर्पित किया है। उनके त्याग के कारण ही हम आज इस महान परम्परा के उत्तराधिकारी हैं।

हमारा भारत इतना अद्भुत है कि देवता भी यहाँ जन्म लेने की अभिलाषा करते हैं। 

गायन्ति देवाः किल गीतकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

इसलिए भारत में जन्म लेना केवल गौरव का विषय नहीं, उत्तरदायित्व का भी विषय है।

आज आवश्यकता है कि हम विश्वास रखें, धैर्य रखें, अपनी जड़ों से जुड़ें और राष्ट्र तथा सनातन संस्कृति के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

भारत संकटों से हारने वाला राष्ट्र नहीं है।

भारत संकटों से शक्ति प्राप्त करके पुनः खड़ा होने वाला राष्ट्र है।।

[13/09, 06:58] Praveen: प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  द्वितीया / तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५३

परिस्थितियों से व्याकुल न हों आगे चलते रहें योजनाएं बनाते रहें l 


यह भारतभूमि अद्भुत है। असंख्य संकटों को झेलकर भी यह बार-बार विश्वास, धैर्य और आत्मशक्ति के साथ खड़ी हो जाती है। विषम से विषम, गम्भीर से गम्भीर और भयानक परिस्थितियाँ भी इसकी जीवनधारा को रोक नहीं सकीं।

ऐसे ही एक अत्यन्त कठिन काल में, जब अकबर का शासन था और सनातन धर्म के सम्मुख अनेक प्रकार की चुनौतियाँ उपस्थित थीं, चिन्तक और विचारक व्याकुल थे—सनातन धर्म कैसे सुरक्षित रहे? हमारी संस्कृति कैसे बचे? देश की आत्मा को कैसे जीवित रखा जाए?

ऐसे कालखण्ड में महामनीषी गोस्वामी तुलसीदासजी का प्राकट्य हुआ और श्रीरामचरितमानस जैसी अमर कृति का निर्माण हुआ। मानस ने केवल कथा नहीं सुनाई; उसने समाज को आस्था, मर्यादा, पुरुषार्थ, संगठन, त्याग, शौर्य, पराक्रम और राष्ट्रबोध की शक्ति प्रदान की। यह अद्भुत कृति है l 


तुलसीदासजी स्वयं कहते हैं—

नौमी भौम बार मधुमासा।

अवधपुरी यह चरित प्रकासा॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं।

तीरथ सकल जहाँ चलि आवहिं॥

तुलसीदास जी के गुरु थे नरहर्यानंद दास जी l

 गुरु और शिष्य तुलसीदासजी का सम्बन्ध केवल औपचारिक शिक्षा का सम्बन्ध नहीं था; यह जीवन-निर्माण और साधना का सम्बन्ध था। गुरु ने तुलसीदासजी के भीतर सुप्त सामर्थ्य को जाग्रत किया और वही सामर्थ्य आगे चलकर करोड़ों लोगों के जीवन का आलोक बना।

हमारी परम्परा में गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं है; वह जीवन की दिशा देने वाला, अन्तःशक्ति को जगाने वाला और साधना को लोकमंगल से जोड़ने वाला होता है।

यह देश केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है।

हमारे भीतर यह भाव जागना चाहिए—

यह देश मेरा, धरा मेरी, गगन मेरा;

इसके लिए समर्पित हो जीवन मेरा।

इस राष्ट्र की रक्षा और उसकी सनातन चेतना को अक्षुण्ण रखने के लिए असंख्य ज्ञात-अज्ञात महापुरुषों ने अपना जीवन अर्पित किया है। उनके त्याग के कारण ही हम आज इस महान परम्परा के उत्तराधिकारी हैं।

हमारा भारत इतना अद्भुत है कि देवता भी यहाँ जन्म लेने की अभिलाषा करते हैं। 

गायन्ति देवाः किल गीतकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

इसलिए भारत में जन्म लेना केवल गौरव का विषय नहीं, उत्तरदायित्व का भी विषय है।

आज आवश्यकता है कि हम विश्वास रखें, धैर्य रखें, अपनी जड़ों से जुड़ें और राष्ट्र तथा सनातन संस्कृति के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

भारत संकटों से हारने वाला राष्ट्र नहीं है।

भारत संकटों से शक्ति प्राप्त करके पुनः खड़ा होने वाला राष्ट्र है।।


भैया (डा )अजय कटियार जी के किस परामर्श की आचार्य जी ने चर्चा की, नियम का परिपालन क्या शक्ति प्रदान करता है, हनुमान अंश का उल्लेख क्यों हुआ,कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया, वसिष्ठ जी का विशेष उल्लेख क्यों हुआ, मन्त्र -पूत कुशा क्या है जानने के लिए सुनें l